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England vs India : 'टेस्ट' में फेल हुए टी-20 के बादशाह

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1   //    05 Aug 2018, 11:29 IST

'इंग्लैंड के खिलाफ पहले टेस्ट में भारत 31 रन से हार गया।' यह कोई बहुत बड़ी या शर्मनाक हार नहीं है लेकिन भारतीय बल्लेबाजों ने जिस तरह से पूरे मुकाबले में खेला वह कई सवाल पैदा करता है। साथ ही चयनकर्ताओं ने जो टीम संयोजन तैयार किया और कप्तान ने अंतिम एकादश बनाया उसे लेकर भी संदेह होता है। इस मुकाबले को भारत और इंग्लैंड के बीच न कह कर कोहली बनाम इंग्लैंड की संज्ञा दें तो ज्यादा बेहतर होगा। गेंदबाजों ने तन्मयता के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाई। मैच की पहली पारी हो या दूसरी, उन्होंने इंग्लैंड को बांधने का काम किया। वहीं बल्लेबाजी ने निराश किया। उन्होंने लापरवाही से बल्लेबाजी की। ऐसे प्रदर्शन को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि कोहली साहब एक बार फिर अंतिम एकादश पर विचार कीजिए।

दरअसल, भारत के चरमराते मध्यक्रम की चर्चा मैं पहले भी कर चुका हूं। यह समस्या बीते दो-तीन सालों से भारतीय टीम को परेशान कर रही है। इंग्लैंड के खिलाफ पहले टेस्ट में बची-खुची कमी शीर्ष क्रम ने भी पूरी कर दी। दोनों पारियों में सलामी बल्लेबाजों के बनाए रन का योग 100 के भीतर सिमट गया। वहीं मध्य क्रम भी इसी आंकड़े के दायरें में दम तोड़ गया। वर्ल्ड कप 2019 की तैयारियों के लिहाज से तो इसे कतई अच्छा नहीं कहा जा सकता। इन सब के बीच बचे कप्तान विराट कोहली, जिन्होंने डूबती नैया को पार लगाने की भरपूर कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हो सके।

बात कड़वी है लेकिन सत्य भी। जिस लोकेश राहुल को चेतेश्वर पुजारा जैसे विशेषज्ञ टेस्ट बल्लेबाज पर तरजीह दी गई उन्होंने मैच के दोनों पारियों को मिलाकर भी 50 रन का आंकड़ा पार नहीं किया। वहीं हाल के प्रदर्शन को देखते हुए युवा ऋषभ पंत को नजरअंदाज कर दिनेश कार्तिक को टीम में जगह दी गई थी लेकिन दो कैच छोड़ने के अलावा कई रन गंवा कर उन्होंने टीम को निराश ही किया। बेहतरी की उम्मीद लिए टीम में प्रवेश करने वाले अजिंक्य रहाणे के भी बल्ले से महज 17 रन ही स्कोर बोर्ड पर टंग पाए। अब सवाल यही है कि क्या इन्हीं लोगों के सहारे टीम इंडिया विश्व विजेता बनने का ख्वाब देख रही है।

सपाट पिच पर ही चलती है बादशाहत

बीते कुछ समय से भारतीय बल्लेबाजों के आंकड़े को देखें तो पाएंगे कि सिर्फ सपाट पिचों पर ही उनकी बादशाहत चलती है। एक कोहली को छोड़ दें तो बाकी सभी बल्लेबाजों ने आड़े-तिरछे बल्ले से रन बनाने को ही मुकद्दर मान लिया है। टी-20 प्रीमियर लीग में रन बटोरना ही उनकी प्राथमिकता बन गई है। इस मैच में पिच को दोषी कहा जा सकता है जो बल्लेबाजों के प्रतिकूल थी लेकिन विकेट के सामने समय बिताने से भी भारतीय बल्लेबाज घबड़ाते दिखे। पहली पारी हो या दूसरी, ज्यादातर बल्लेबाज अपनी गलती से ही आउट होकर पवेलियन लौटे। आलम तो यह था कि पहली पारी में मध्य क्रम से ज्यादा अच्छा पुछल्ले बल्लेबाजों ने खेला। उन्हीं की बदौलत कोहली शतक लगा पाए और टीम को 250 के पार पहुंचाने में कामयाब रहे।

सलामी जोड़ी पर विचार करें कप्तान

एक मैच से ही किसी को परखना सही नहीं है लेकिन यह कहने में भी कोई संकोच नहीं है कि भारतीय कप्तान को एक नई सलामी जोड़ी पर विचार करना चाहिए। शिखर धवन हो या रोहित शर्मा दोनों के प्रदर्शन में निरंतरता की घोर कमी है। रोहित पांच मैचों में फेल होने के बाद एक अच्छी पारी खेल कर टीम में अपनी जगह बाचाए रखते हैं तो धवन भी कुछ बेहतरीन पारियों की बदौलत ही कप्तान के चहेते बने हुए हैं। धवन ने हाल के विदेश में खेले गए मैचों में बहुत बेहतर नहीं किया है। इस लिहाज से उनकी जगह किसी और तलाशना बेमतलब नहीं है। मुरली विजय के बारे में तुरंत कुछ कहना सही नहीं होगा क्योंकि उन्होंने टेस्ट में अच्छा किया है।

अन्य खिलाड़ियों की भूमिका भी तय हो

अजिंक्य रहाणे ने पिछले कई मैचों से कोई बड़ी पारी नहीं खेली है। इस मुकाबले में भी वह नाकाम रहे। वहीं दिनेश कार्तिक को खराब विकेट कीपिंग के बाद भी टीम में शामिल किया जा रहा है। हार्दिक पंड्या को बल्लेबाज के रूप में टीम में जगह दी गई है या गेंदबाज, यह समझना मुश्किल है। पंड्या भले ही हरफनमौला हैं लेकिन किसी एक विभाग में उनकी मजबूती से ही कप्तान उनकी उपलब्धि का फायदा ले सकता है। रहाणे, राहुल और कार्तिक की भूमिका भी तय होनी चाहिए। इन बल्लेबाजों को टीम में क्यों जगह दी गई है, कप्तान को उन्हें समझाना चाहिए। दोनों ही पारियों में बेपरवाह होकर विकेट गंवाने वाले इन बल्लेबाजों को पता होना चाहिए कि उन्हें क्रीज पर खड़े होने और संकट में टीम को संभालने के लिए ही टीम में शामिल किया गया है।

टेस्ट और एक दिवसीय की टीम हो अलग

अब शायद यह समय आ गया है जब टेस्ट और एक दिवसीय मैचों के लिए अलग-अलग खिलाड़ियों को तैयार किया जाए। बात सिर्फ भारतीय टीम की नहीं है बल्कि विश्व की ज्यादातर टीमें टेस्ट मैच में फुस्स साबित हो रही हैं। मैच पांच दिन के बजाय तीन और चार दिन में ही खत्म होने लगे हैं। बल्लेबाजों में न तो दो दिन लगातार खेलने की क्षमता बची और न ही रुचि। टी-20 के दौर में बल्लेबाजों ने हर गेंद को बाउंड्री के बाहर भेजने को ही क्रिकेट समझ लिया है। आलम यह है कि टी-20 विश्व कप जीतने वाली टीम टेस्ट में फेल हो जा रही है। चयनकर्ताओं को इस पर काम करने की जरूरत है ताकि दोनों के लिए कुछ विशेषज्ञ खिलाड़ी तैयार हो सकें।

क्षेत्ररक्षण करें दुरुस्त

किसी मैच को जीतने के लिए कसी हुई गेंदबाजी और बेहतरीन बल्लेबाजी के बाद खिलाड़ियों को क्षेत्ररक्षण में भी कमाल करना होता है। याद करें वो दौर जब भारतीय टीम महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में लगातार जीत दर्ज कर रही थी, तब भारत का हर विभाग चुस्त था। क्षेत्ररक्षण के मामले में तो उसने ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीकी टीम तक को टक्कर दे दी थी। इंग्लैंड के खिलाफ मैच में ऐसा कुछ नहीं दिखा। भारतीय खिलाड़ियों ने कई गलतियां की। स्लिप के खिलाड़ियों ने बेहद खराब क्षेत्ररक्षण का नमूना पेश किया। पहली पारी में अजिंक्य रहाणे तो दूसरी पारी में शिखर धवन, इनकी गलती की सजा भारत को हार रूप में मिली। विकेट कीपिंग में भी दिनेश कार्तिक ने खराब प्रदर्शन किया। एक तरफ जहां दुनिया की कमजोर टीमें भी अपने फील्डर्स को चुस्त रखने के लिए हर प्रयास कर रहे हैं वहीं भारत जैसे दिग्गज के लिए तो यह बेहद जरूरी हो गया है। यो-यो टेस्ट पास करने से टीम में जगह तो मिल जाती है लेकिन खिलाड़ी असली टेस्ट में फेल हो जाते हैं।

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