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3 भारतीय क्रिकेटर जिन्होंने सचिन की तरह साल 1989 में अंतरराष्ट्रीय डेब्यू किया था लेकिन ज़्यादा क़ामयाब नहीं हो सके

18   //    20 May 2018, 09:15 IST
सचिन तेंदुलकर वो शख़्सियत हैं जिनका नाम क्रिकेट की दुनिया में बहुत ही सम्मान के साथ लिया जाता है, उन्होंने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर की शुरुआत साल 1989 में की थी। अपने करियर के शुरुआती दौर में उन्होंने कई नाकामियों का भी सामना किया है, उन्हें उस वक़्त ये लग रहा था कि शायद वो टीम इंडिया के साथ इतना लंबा करियर नहीं खेल पाएंगे।

सचिन तेंदुलकर ने वनडे में डेब्यू करने के 5 साल बाद पहला शतक लगाया था, टेस्ट में भी ख़ुद को स्थापित करने में सचिन को थोड़ा वक़्त लग गया था। हांलाकि सचिन के हुनर का पता दुनिया को पहली ही अंतरराष्ट्रीय सीरीज़ में लग गया था, लेकिन उन्होंने ख़ुद को साबित करने के लिए उन्हें इंतज़ार करना पड़ा था। पहले शतक के बाद जैसे अंतरराष्ट्रीय शतकों का अंबार लग गया था। आज वो टेस्ट और वनडे में शतक लगाने के मामले में सबसे आगे हैं।

इस बात में कोई शक नहीं कि सचिन क्रिकेट के बेताज बादशाह रहे हैं उनके करियर की अवधि और रिकॉर्ड इस बात को साफ़ बयान करते हैं। वो क्रिकेट के महानतम खिलाड़ियों में से एक हैं और उनका टीम इंडिया के लिए योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता है। लेकिन 3 भारतीय क्रिकेटर ऐसे भी हैं जिन्होंने सचिन की तरह साल 1989 में अपने करियर की शुरुआत की थी लेकिन क्रिकेट की दुनिया में मास्टर ब्लास्टर जैसा नाम नहीं कमा सके, आइए इन 3 खिलाड़ियों के बारे में जानते हैं।

#3 रॉबिन सिंह




 

अगर फ़ील्डिंग की बात करें तो रॉबिन सिंह भारतीय क्रिकेट में बड़ा नाम थे, वो पहले ऐसे क्रिकेटर थे जिन्होंने इस बात को समझा कि भारतीय हालात में फ़ील्डिंग की अहमियत क्या है, उन्होंने इस क्षेत्र में काफ़ी काम किया और विपक्षी टीम के रन रोकने में काफ़ी मदद भी की। रॉबिन पहले ऐसे खिलाड़ी थे जिन्होंने टीम इंडिया के लिए साल 1989 में डेब्यू किया था। उन्होंने वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ पोर्ट ऑफ़ स्पेन में पहला वनडे मैच खेला था। हांलाकि उस मैच में वो कुछ ख़ास नहीं कर पाए और 5 गेंदों में महज़ 3 रन ही बना पाए।

वो 1990 के दशक में टीम इंडिया के एक अहम सदस्य थे। उन्हें कई अच्छे प्रदर्शन के बदौलत साल 1998 में एक टेस्ट मैच खेलने का मौका मिला, लेकिन ये उनके लिए पहला और आख़िरी टेस्ट मैच साबित हुआ। उनका वनडे करियर जारी रहा इसकी वजह ये थी कि भारत के पास रॉबिन सिंह और जडेजा के सिवा कोई ज़्यादा अच्छा मध्य क्रम का बल्लेबाज़ नहीं था। 136 वनडे मैच में उन्होंने 26 की औसत से 2985 रन बनाए थे, जिसमें एक शतक भी शामिल था।
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