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5 महान भारतीय क्रिकेटर जो कभी अपने देश की कप्तानी नहीं कर पाए

मयंक मेहता

क्रिकेट में एक कप्तान की वही भूमिका होती है, जोकि फुटबॉल में एक मैनेजर की होती हैं। कप्तान के ऊपर टीम को संभालने की, रणनीति बनाना और मैदान के अंदर उनपर अमल करने की ज़िम्मेदारी होती है।

कप्तान का रोल फील्डर्स को सही जगह पर लगाना और एक अच्छी प्लेइंग इलेवन चुनना होता है। एक कप्तान के तौर पर उसे अपने खिलाड़ियों और टीम का मनोबल हमेशा बढ़ाना होता हैं।

पिछले कुछ सालों में इंडियन क्रिकेट टीम काफी किस्मत वाली रही कि उसे टीम के लिए अच्छे कप्तान मिले, जिन्होंने टीम को एक अलग स्थान दिलाया।

हालांकि कुछ खिलाड़ी ऐसे भी रहे, जोकि इस खेल के लेजेंड है, लेकिन उन्हें कभी भी टीम की कमान नहीं मिली। वो अपने आप को अनलकी कह सकते है, लेकिन टीम में कप्तान के तौर पर उनसे ज्यादा अच्छे विकल्प खुले थे।

आइये नज़र डालते है, उन 5 क्रिकेटर्स पर

# ज़हीर खान

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कपिल देव के बाद निश्चित ही ज़हीर खान इंडिया के सबसे सफल तेज़ गेंदबाज रहे और उन्होंने अपने डेब्यू से ही अपने टैलंट का परिचय भी दिया है।

ज़हीर गेंद को लेट स्विंग भी कराते थे, इसके अलावा वो खतरनाक यॉर्कर्स भी डाल सकते थे। बायें हाथ के बल्लेबाजों के खिलाफ वो काफी खतरनाक साबित होते थे। एंड्रयू स्ट्रॉस और ग्रीम स्मिथ का रिकॉर्ड ज़हीर खान के खिलाफ बहुत ही खराब हैं, जो उनकी असल क्षमता भी दिखाता है।

जैसे-जसे वो मैच्योर होते गए, उनकी टीम में इज्ज़त भी काफी बढ़ गई और उन्हें एक सीनियर खिलाड़ी के तौर पर देखा जाने लगा। वो हमेशा ही युवा गेंदबाजों से बात करते थे और उन्हें सही से समझाते भी थे। उन्हें गेंदबाजों का कप्तान भी कहा जाता था, यह टाइटल उन्हें खुद कप्तान एमएस धोनी ने दिया था। हालांकि उन्होंने खुद को कभी टीम का लीडर नहीं माना, क्योंकि टीम में सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़, अनिल कुंबले और एमएस धोनी शामिल थे।

ज़हीर ने मुंबई की रणजी टीम और दिल्ली डेयरडेविल्स की कप्तानी की हैं। उन्होंने यह साबित भी किया कि उनके अंदर कप्तानी के सारे गुण मौजूद है। अगर उनके पास किसी बल्लेबाज़ के लिए कोई प्लान हो तो, वो उसे आज़माने से नहीं डरते, जोकि एक कप्तान की पहली निशानी होती है।

हालांकि वो कभी भी इंडिया की कप्तानी नहीं कर पाए।

# वीवीएस लक्ष्मण

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2000 से लेकर 2010-11 तक वीवीएस लक्ष्मण टेस्ट में टीम इंडिया की बल्लेबाज़ी के संकटमोचन थे। उनके अलावा टीम में सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़ और वीरेंदर सहवाग शामिल थे, इसके बावजूद लक्ष्मण ने टीम में अपने लिए एक बड़ी जगह बनाई।

लक्ष्मण ने हमेशा ही टीम को मुश्किल से उभारा और टीम को जीत दिलाई। उनके नाम टेस्ट में 8,781 रन थे और वो टेस्ट में इंडिया की तरफ से सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाजों की सूची में वो चौथे नंबर हैं। टीम में 15 साल तक खेलने के बाद भी उन्हें कभी भी टीम का कप्तान नहीं बनाया गया।

हालांकि लक्ष्मण ने डेक्कन चार्जर्स की कप्तानी की है और वो इस समय सनराइजर्स हैदराबाद के मेंटर भी हैं। इसके अलावा वो कमेंटेटर भी है और वो गेम को काफी अच्छे से समझते है।

# इरापल्ली प्रसन्ना

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प्रसन्ना ने फ्लाइट, लूप और ड्रीफ्ट की मदद से हमेशा यह साबित किया कि एक स्पिनर को कैसे गेंद करना चाहिए। उन्हें हमेशा ही गेंदबाजी करते देखने में काफी मज़ा आता था, खासकर जिस तरह वो बल्लेबाजों को चकमा देते थे।

उनके नाम 49 टेस्ट में 189 विकेट थे, जो उनकी काबिलियत दिखाता है। लेकिन वो ड्रेसिंग रूम में होने वाली राजनीति के कारण कभी भी टीम में अपनी जगह पक्की नहीं कर पाए। यही उनकी असल ताकत का पता चला और वो बल्लेबाजों के दिमाग को अच्छे से पढ़ सकते थे।

एक स्पिनर के तौर पर आपको हमेशा ही प्रो एक्टिव होना पड़ता है, जोकि आपको एक अच्छा कप्तान भी बनाता है। लेकिन प्रसन्ना को हमेशा ही श्रीनिवास वेंकटराघवन के बाद ही मौका दिया जाता था, दोनों कप्तान और एक गेंदबाज के तौर पर।

# हरभजन सिंह

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अगर प्रसन्ना मास्टर थे, तो हरभजन स्पिन गेंदबाज के तौर पर इंडिया को बहुत आगे लेकर गए।

पंजाब के इस खिलाड़ी ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ हुई 2001 में सीरीज में शानदार करने के बाद से पीछे मुड़कर नहीं देखा है। उन्होंने अपने करियर में अच्छा और बुरा समय दोनों देखे है, लेकिन 269 वनडे और 417 टेस्ट विकेट लेने वाले हरभजन निश्चित ही भारत के मॉडर्न डे के इंडियन क्रिकेट के लेजेंड हैं।

हालांकि उन्हें कभी भी टीम की कप्तानी करने का मौका नहीं मिला है, यहाँ तक जिन दौरों पर टीम के नियमित कप्तान नहीं गए, वहाँ भी उन्हें मौका नहीं मिला है। उनके पास कप्तानी का पूरा अनुभव है, उन्होंने मुंबई इंडियंस और पंजाब रणजी टीम की भी कप्तानी भी की है, लेकिन चयनकर्ताओ ने कभी उन्हें यह मौका नहीं दिया।

# भगवत चंद्रशेखर

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भगवत चंद्रशेखर ने अपने करियर में 58 मुकाबलों में 29.74 की औसत से 242 विकेट लिए है।

चंद्रशेखर एक स्पिनर के तौर पर काफी साल खेले और उनका करियर काफी लंबा रहा, लेकिन वो कोई साधारण से स्पिनर नहीं है। वो गुगली के साथ लेग ब्रेक्स का अच्छा इस्तेमाल करते थे, अपनी इसी कला से उन्होंने टीम के लिए काफी अच्छा किया।

ओवल में इंग्लैंड के खिलाफ मिली पहली जीत में उन्होंने एक अहम भूमिका निभाई और 38 रन देकर 6 विकेट हासिल किए। हालांकि वो टीम के लीडर नहीं बन पाए और ना ही उनको टीम की कप्तानी मिली।

लेखक- मनीष पाठक, अनुवादक- मयंक महता

Edited by Staff Editor

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