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भारतीय क्रिकेट इतिहास की 5 सबसे हाई-प्रोफाइल बर्खास्तगी

सौम्या तिवारी
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उपमहाद्वीप में क्रिकेट को एक खेल से कहीं ज्यादा माना जाता है। जीतने पर फैंस द्वारा खिलाड़ियों को सर आंखो पर बैठाया जाता है और इसके परिणामस्वरूप उनके जीवन के हर पहलू पर सबकी नजर होती है। ऐसे में जब टीम हारती है तोकप्तान और कोचों को भावुक जनता के गुस्से का सामना करना पड़ता है। भारत में कुछ स्टार कप्तानों को भी टीम के खराब परिणामों या फिर अपने स्वयं के फॉर्म के कारण खामियाजा भुगतना पड़ा है। यहां तक कि कुछ अवसरों पर टीम के कोचों को भी इससे काफी नुकसान हुआ है। आईये आज हम भारतीय क्रिकेट के इतिहास के पांच उच्च स्तरीय बर्खास्तगी पर नजर डालते हैं- जिन खिलाड़ियों को ड्रॉप कर दिया गया उन्हें इस लिस्ट में जगह नहीं दी गई है। इसमें केवल कप्तानों, कोच और चयनकर्ताओं को शामिल किया गया है। #5. सुनील गावस्कर- कप्तान (1979)

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सन् 1978-79 में बिशन सिंह बेदी से कप्तान का पद संभालने के बाद सुनील गावस्कर ने वेस्ट इंडीज़ के खिलाफ घरेलू सीरीज में अपनी पहली जीत हासिल की। हालांकि केरी पैकर की वर्ल्ड सीरीज ऑफ क्रिकेट के परिणामस्वरूप कैरेबियाई टीम के सामने भारतीय टीम कुछ कमजोर थी फिर भी बल्लेबाज़ी के मजबूत नेतृत्व ने तत्कालीन भारतीय टीम को मेहमान टीम के खिलाफ 1-0 की श्रृंखला में जीत दिलाने के लिए प्रेरित किया, जिसमें एल्विन कालीचरण, सिल्वेस्टर क्लार्क और मैल्कम व मार्शल जैसे खिलाड़ी मौजूद थे। पूर्णकालिक कप्तान के रूप में अपनी पहली सीरीज जीतने के बावजूद गावस्कर से 1979 के इंग्लैंड दौरे के लिए कप्तानी से हटा दिया गया। उनकी जगह पर श्रीनिवास वेंकटराघवन को कप्तानी सौंपी गई। भारतीय बोर्ड ने जोर देकर कहा कि वेंकटराघवन को डर्बीशायर के साथ खेलते हुए इंग्लैंड की परिस्थितियों का काफी अनुभव है। इसकी वजह से उनको कप्तानी सौंपी गई। हालांकि इसके बाद गावस्कर ने एक शानदार दोहरा शतक बना कर सबको जवाब दे दिया, जिसने ओवल में रनों का पीछा करते हुए शानदार तरीके से अपनी टीम को जीत की कगार पर ला दिया। हालांकि टीम 438 के विशाल लक्ष्य से 9 रन से पीछे रह गयी और यह मैच अंततः एक शानदार ड्रॉ पर खत्म हो गया। #4. संदीप पाटिल- कोच (1996)

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1983 में विश्व कप जीतने वाली टीम का एक अभिन्न अंग संदीप पाटिल एक बहुत ही प्रतिभावान खिलाड़ी रहे। वह राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी के निर्देशक थे और बीसीसीआई के चयनकर्ताओं के अध्यक्ष थे। उन्होंने केन्या को 2003 के विश्व कप के सेमीफाइनल तक पहुंचाने में कोच की भूमिका निभाई थी। भारत ए टीम के साथ अपने कोचिंग कौशल का प्रदर्शन करने के बाद उन्होंने अजित वाडेकर के उत्तराधिकारी के रूप में 1996 में भारतीय टीम के कोच का पदभार ग्रहण किया। हालांकि उनकी नियुक्ति बहुत ही संक्षिप्त थी। इंग्लैंड के खिलाफ टीम के खराब प्रदर्शन के लिए उन्हें बलि का बकरा बनाया गया। भारत एकदिवसीय सीरीज 0-2 से हार गया और टेस्ट श्रृंखला में 0-1 से खराब प्रदर्शन करते हुए आत्मसमर्पण कर दिया। भारतीय बोर्ड ने पाटिल की जगह उनके पूर्व टीम सदस्य मदन लाल को कोच बना दिया। #3. सचिन तेंदुलकर- कप्तान (1997- 98)

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90 के दशक के दौरान भारतीय टीम घरेलू परिस्थितियों में एक प्रभावशाली टीम बन रही थी। खिलाड़ी अपने कंफर्ट ज़ोन से बाहर निकल कर खेल रहे थे। हालांकि भारतीय बोर्ड के धैर्य की कमी के कारण कई यात्रा के मुद्दे सामने आए। कप्तान और कोच दोनों के बदलाव के कारण भी टीम लाइनअप में कई रूकावट पैदा हो रही थी। कप्तानी मोहम्मद अजरूद्दीन और सचिन तेंदुलकर के बीच एक व्यवसायिक खेल बन गई थी। जहां एक पूर्व कप्तान ने टर्निंग ट्रैंक पर भारतीय स्पिनर को संभालने की प्रशंसनीय योग्यता दिखाई तो वहीं दूसरा कप्तान बल्ले से उसी सफलता को दोहराने में असफल रहा। 1997-98 में श्रीलंका के खिलाफ घरेलू श्रृंखला के अंत में तेंदुलकर को कप्तानी से हटा दिया गया। कई सालों बाद तेंदुलकर ने खुलासा किया कि उन्हें मीडिया के किसी सदस्य से बर्खास्त करने के बारे में पता चला था। सचिन ने 'प्लेइंग इट माय वे' नामक अपनी आत्मकथा में लिखा है कि भारतीय बोर्ड ने उन्हें जिस तरह से कप्तानी से हटाया था उससे वो काफी दुखी हुए थे और इसी वजह से उन्हें बेहतरीन बल्लेबाजी करने की प्रेरणा मिली। #2. सौरव गांगुली- कप्तान (2005)

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अपनी कप्तानी के चोटी पर पहुंच कर सौरव गांगुली महान इमरान खान के भारतीय समकक्ष थे। 'कोलकाता के राजकुमार' ने विदेशी दौरों पर युवा खिलाड़ियों को मौका देकर भारतीय क्रिकेट की दशा-दिशा ही बदल दी थी। 2005 में ग्रेग चैपल की कोच के रूप में नियुक्ति के बाद उनके और चैपल के बीच संबंध अच्छे नहीं रहे। उन दोनों के बीच विवादों और आसपास की घटनाओं ने पूरे देश में सुर्खियां बनायी। बल्ले के साथ गांगुली के गिरते प्रदर्शन के कारण नवनिर्वाचित कोच ने उन्हें कप्तानी से हटने को कहा। जब गांगुली अपने पद पर बने रहे तो चैपल ने उन्हें एक युवा बल्लेबाज के लिए प्लेइंग इलेवन से हटाने की धमकी दी। जिसके बाद जिम्बाब्वे दौरे के समापन पर चैपल ने भारतीय बोर्ड को एक ईमेल भेज दिया। कुछ महीने बाद, चयनकर्ताओं ने गांगुली को कप्तानी से हटा दिया और उनके स्थान पर राहुल द्रविड़ को नियुक्त किया गया। गांगुली की चिंताएं यहीं नहीं रुकी क्योंकि उन्हें जल्द ही टीम से बाहर कर दिया गया था। हालांकि, उन्होंने टीम में आने के लिए हौसला नहीं छोड़ा और भारतीय क्रिकेट इतिहास में एक सबसे यादगार वापसी की। #1. मोहिंदर अमरनाथ- चयन समिति (2012)

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चयन पैनल के उत्तरी क्षेत्र के प्रतिनिधि के रूप में मोहिंदर अमरनाथ को समिति का अगला अध्यक्ष बनने का अनुरोध किया गया था। हालांकि, चीजें तब पूरी तरह से अलग हो गईं जब ऑस्ट्रेलिया में भारत को टेस्ट सीरीज में 0-4 से सनसनीखेज हार का सामना करना पड़ा। बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी के 2011-12 के संस्करण के अंत में चयन समिति ने एमएस धोनी को बाहर करने और आगामी एकदिवसीय त्रिकोणीय श्रृंखला के लिए युवा कप्तान बनाने के लिए कहा। बीसीसीआई अध्यक्ष एन श्रीनिवासन ने एम एस धोनी का साथ देते हुए चयनकर्ताओं के फैसले को उलट दिया गया। मोहिंदर अमरनाथ को अपने मुखर होने के लिए कीमत चुकानी पड़ी और उन्हें चयन समिति से हटा दिया गया। लेखक- राम कुमार अनुवादक- सौम्या तिवारी

Edited by Staff Editor
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