5 ऐसे मैदानी घटनाक्रम जो ये साबित करते हैं कि अनिल कुंबले भारत के महान कोच होंगे

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इस देश में लाखों-करोड़ो लोग क्रिकेट देखते हैं और बहुत से ऐसे लोग हैं जिनके अनिल कुंबले बचपन के हीरो रहे हैं। उनके 1999 के दिनों को कौन भूल सकता है। पाकिस्तान के खिलाफ पहला टेस्ट चेन्नई में हारने के बाद दिल्ली में हुए दूसरे टेस्ट में जो कुछ हुआ था। उससे अनिल कुंबले ने इतिहास बनाते हुए बतौर हीरो पेश आये थे। पाकिस्तान की दूसरी पारी में उसके बल्लेबाज़ एक के बाद एक कुंबले का शिकार हो रहे थे। एक पारी के सभी 10 विकेट लेने के बाद ये खिलाड़ी दिग्गज के तौर पर उभरा था। अब यही खिलाड़ी भारतीय टीम का मुख्य कोच बनाया गया है। कुंबले अपना कार्यभार वेस्टइंडीज के साथ होने वाले टेस्ट सीरीज से संभाल लेंगे। वहीं अगर उनके खेलने के दिनों को याद किया जाये तो वह कमाल के खिलाड़ी थे, लेकिन बतौर कोच अभी उनका कोई बहुत बड़ा अनुभव नहीं रहा है। ऐसे में हम आपको 5 ऐसे मौकों के बारे में बताना चाहते हैं, जब अनिल 'जंबो' कुंबले ने एक बेहतरीन परफ़ॉर्मर और लीडर के तौर पर ख़ुद को साबित किया। #1 2002: टूटे हुए जबड़े के बावजूद उन्होंने गेंदबाज़ी की ये क्रिकेट के इतिहास का बहुत ही साहसिक और अतुल्य प्रदर्शन था। भारत साल 2002 में वेस्टइंडीज के दौरे पर था। अनिल कुंबले का मर्वन ढिल्लन की बाउंसर लगने से जबड़ा टूट गया था। लेकिन उन्होंने तबतक बल्लेबाज़ी की जबतक की वह आउट नहीं हुए। इसके अलावा जब टूटे जबड़े पर पट्टी बांधकर कुंबले गेंदबाज़ी करने आये तो क्रिकेट के दीवानों का दिल जीत लिया। साहसी कुंबले ने हार न मानते हुए अपने 14वें ओवर में दिग्गज बल्लेबाज़ ब्रायन लारा का विकेट भी लिया, वह दिल से गेंदबाज़ी कर रहे थे। इसके बाद जो कुछ अंटीगुआ में हुआ वह क्रिकेट के इतिहास में दर्ज हो गया। कुंबले का ये महान चरित्र दिखाता है कि वह अपने कोचिंग करियर में भी खुद को साबित करेंगे। वह ऐसे खिलाड़ी हैं, जिसने अपने देश के लिए सबकुछ किया है। ऐसे में ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि बतौर कोच कुंबले अपना 100 फीसदी देंगे।#2 2003 क्रिकेट विश्वकप: भारत बनाम नीदरलैंड- पूल ए, 7वां मैच anil-kumble-2003-world-cup-1466754198-800 साल 2003 के विश्वकप में कप्तान सौरव गांगुली ने अनिल कुंबले को बाद के मैचों में अंतिम एकादश से बाहर बिठाये रखा। उस वक्त केन्या के कोच संदीप पाटिल ने कहा, “हमारे सभी बल्लेबाज कुंबले को सबसे बड़ा खतरा मानते थे।” लेकिन सेमीफाइनल में कुंबले के बाहर होने से उन्होंने राहत की सांस ली। हालांकि कुंबले ने पहले मैच में जहां बल्लेबाज़ असफल रहे थे, कमाल की गेंदबाज़ी करते हुए भारत के कम स्कोर 204 को भी डिफेंड करने में मदद की थी। लेकिन कुंबले और जवागल श्रीनाथ ने मिलकर नीदरलैंड को 136 रन पर रोक दिया था। कुंबले ने 3.20 के इकॉनमी की मदद से 4 विकेट लिए थे। इससे इस महान खिलाड़ी के विपरीत परिस्थितियों में भी बेहतरीन प्रदर्शन करने के बारे में पता चलता है।#3 2004: सिडनी में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ चौथा टेस्ट 79115031-1466742208-800 साल 2004 में भारत ऑस्ट्रेलिया के दौरे पर था जिसमें सौभाग्य से अनिल कुंबले भी थे। उस वक्त ये माना जा रहा था कि उन्हें टीम के पहली पसंद वाले स्पिन गेंदबाज़ हरभजन के चोटिल होने की वजह से दोबारा बुलाया गया है। तब कुंबले ने चयनकर्ताओं को गलत साबित किया था। ये सीरीज अनिल कुंबले के करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुई और उन्होंने अपने ही स्टाइल में वापसी की। ऑस्ट्रेलिया ने मेलबर्न में हुए बॉक्सिंग डे टेस्ट में जीत हासिल करने के बाद मोमेंटम हासिल कर लिया था। हालांकि इस मैच में भारत ने पहली पारी में कमाल की बल्लेबाज़ी करते हुए बड़ा स्कोर बनाया था। स्टीव वॉ ने धीमी लेकिन अच्छी साझेदारी वाली बल्लेबाज़ी करते हुए भारत की जीत को असम्भव बना दिया था। स्टीव वॉ ने क्रीज़ पर लम्बा समय इसलिए बिताया क्योंकि उन्होंने बिना रिस्क लिए बल्लेबाज़ी की खासकर वह कुंबले को खतरा मान रहे थे। जहां वा मुरली कार्तिक के खिलाफ 5.4 रन प्रति ओवर के हिसाब से रन बना रहे थे, तो वहीं कुंबले की 75 गेंदों पर उन्होंने मात्र 18 रन बनाये थे। वहीं ऑस्ट्रेलिया की पहली पारी में कुंबले ने 8 विकेट लिए थे बाकी दो इरफ़ान पठान ने लिए थे। वहीं दूसरी पारी में कुंबले ने 6 में से 4 विकेट लिए थे। बतौर खिलाड़ी जिन्हें इस दौरे पर मौका ही मिल रहा था उस हिसाब से जंबो का गेंदबाज़ी विश्लेषण देखर हर कोई हैरान था। इससे साबित हुआ कि जंबो में काफी दमखम है।#4 2007: इंग्लैंड के खिलाफ पूरे सीरीज में भारत के एकमात्र शतकवीर anil-kumble-celebrates-maiden-century-1466742137-800 क्रिकेट में ही नहीं अब हर खेल में विविधता का होना बहुत ही जरूरी है। अनिल कुंबले को कभी इस खेल का बेहतरीन आलराउंडर नहीं माना जाता था। ऐसे मौके कम ही हैं जब उन्होंने बल्ले से भी प्रभावित किया था। साल 2007 में ओवल, इंग्लैंड में कुंबले ने अपना पहला शतक बनाया था। इससे साबित हुआ था कि अनिल बल्ले और गेंद से एक ही मैच में इतना बेहतरीन प्रदर्शन कर सकते हैं। केविन पीटरसन की वह गेंद जिसे कुंबले ने कीपर के पीछे से निकालकर एक रन बनाया और इस दिग्गज गेंदबाज़ अपने करियर का एक मात्र शतक बना डाला। कुंबले ने कहा था, “हमने कुछ दिन पहले टीम मीटिंग में इस बात पर डिस्कस किया था कि हमारे बल्लेबाजों को इस सीरीज में शतक बनाना होगा। लेकिन मुझे इस बात का बिलकुल अंदाजा नहीं था कि वह कारनामा मैं करूंगा।” एक कोच के लिए ये जरूरी होता है कि वह विभिन्न भूमिकाओं में खुद को साबित करे जिससे टीम को कोच करने में उसे आसानी हो। एक कोच के लिए ये एक अच्छा शतक था। खास बात: इस पूरी सीरीज में कुंबले एकमात्र खिलाड़ी थे जिन्होंने शतक बनाया था। ऐसे में वह दोबारा ड्रेसिंग रूम में जगह पाने के हक़दार हैं। #5 2007-08: ऑस्ट्रेलिया बनाम भारत 2843030-1466742074-800 अनिल कुंबले की लीडरशिप और प्रबन्धन पर जिन्हें जरा सा भी शक है। उन्हें 'मंकीगेट कांड' पर गौर करना चाहिए। उन्होंने इस स्कैंडल पर टीम का कुशल नेतृत्व किया था। उन्होंने सिडनी टेस्ट के बाद प्रेस कांफ्रेंस में कहा था, “इस टेस्ट मैच में सिर्फ एक ही टीम ने खेल भावना का परिचय दिया।” अपने टीम के साथी खिलाड़ी के ऊपर लगे नस्लीय आरोप को कप्तान कुंबले ने झूठा करार दिया था। उन्होंने बड़े शानदार तरीके से इस विवादों से भरी सीरीज में भारतीय टीम का कुशल नेतृत्व किया था। वह न सिर्फ गेंदबाज़ी से ऑस्ट्रेलियाई टीम पर भारी पड़े थे बल्कि वह बतौर कप्तान अपनी टीम के साथ खड़े रहे। वह एक थिकिंग कप्तान और मजबूत लीडर साबित हुए थे। साल 2007-08 सीरीज कुंबले के कुछ यादगार फैसलों के लिए भी याद की जाएगी। उन्होंने टीम में वीरेन्द सहवाग की वापसी करवाई। सहवाग ने अंतिम दो टेस्ट मैचों में बेहतरीन खेल दिखाया और एडिलेड टेस्ट में यादगार 151 रन बनाकर भारत को हार से बचाया। तीसरे टेस्ट में सुबह के सेशन में इशांत शर्मा ने लगातार रिकी पोंटिंग को परेशान किया लेकिन उनका विकेट लेने में असफल रहे। हालाँकि कुंबले ने इशांत शर्मा में अपना भरोसा बनाये रखा और अंततः इशांत ने खतरनाक पोंटिंग चलता कर दिया। इससे विराट कोहली को काफी फायदा होगा, जो उन्हें टीम की डिमांड पर लड़ने से नहीं रोकेगा लेकिन उन्हें चेक कभी करता रहेगा। हालाँकि कुंबले कप्तान की इज्जत और उन्हें पूरी आज़ादी देंगे। लेकिन वह बीसीसीआई और ड्रेसिंग रूम की राजनीति को कंट्रोल करने में अहम भूमिका निभाएंगे, ये वक़्त पर ही निर्भर करता है। लेखक: सूव्रा रॉय, अनुवादक: जितेंद्र तिवारी