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Hindi Cricket News: मैं 1983 में कप्तान नहीं बनना चाहता था : कपिल देव

  • जिम्बाब्वे के खिलाफ 175 रन बनाने के बारे में नहीं सोचा था
Richa Gupta
ANALYST
न्यूज़
Modified 20 Dec 2019, 23:46 IST

कपिल देव
कपिल देव

नीड और ग्रीड में बहुत कम फर्क होता है। मैं जिंदगी में सीखने की कोशिश करता हूं। मुझसे किसी सीनियर क्रिकेटर ने कहा था कि अगर तुम जिंदगी में सफल इंसान बनना चाहते हो तो सोते वक्त भी अपने आंख और कान खुले रखना। ये बातें क्रिकेट इतिहास में पहली बार भारतीय टीम को विश्वकप जिताने वाले कप्तान कपिल देव ने कही। बीते दिनों कपिल देव ने ब्रेकफास्ट विद् चैंपियन में दिए साक्षात्कार में क्रिकेट और अपनी जिंदगी से जुड़े कई सवालों के जवाब दिए।

तब मैं बाथरूम में नहा रहा था

मैंने 1983 विश्वकप में जिम्बाब्वे के खिलाफ 175 रन बनाने के बारे में सोचा नहीं था। मैं इस बारे में भी नहीं सोचता कि उस वक्त मेरे मैच की रिकॉर्डिंग के लिए कैमरे नहीं थे। भगवान ने मौका दिया और मैंने उस दिन को बना दिया। उस वक्त मैं अपने आप से निराश था। जब आप कप्तान होते हैं और ऐसी सिचुएशन आती है तो टेंशन हो जाती है। मैं उस वक्त बाथरूम में नहा रहा था और मुझसे कहा गया कि आ जाओ बाहर तुम्हारी बल्लेबाजी का नंबर आ गया है।

क्रिकेट बोर्ड वाले खिलाड़ियों के साथ खेलते हैं 

25 साल की उम्र में मैंने कप्तानी छोड़ी थी पर मैं परेशान नहीं हुआ। मैं सीधे तौर पर कहता हूं कि क्रिकेट बोर्ड को इस तरह का खेल नहीं खेलना चाहिए कि कभी इसको कप्तान बना दिया तो कभी उसको। मैं 1983 में कप्तान नहीं बनना चाहता था। उन्हें उस वक्त सुनील गावस्कर साहब को कप्तान बनाना चाहिए था। वह सेंसिबल और मैच्योर थे लेकिन नहीं। उस वक्त किसी युवा खिलाड़ी को कप्तान बनाना था तो मुझे बना दिया। 1985 में जब बोर्ड ने हटाया तो भी गलत था क्योंकि उस वक्त मुझे क्रिकेट की समझ होने लगी थी। उस समय मैं स्ट्रॉन्ग हो रहा था कि तभी मुझे काट दिया। फिर गावस्कर साहब को कप्तान बना दिया। इसलिए मैं कहता हूं कि बोर्ड वाले हमारे साथ खेलते हैं।

मुझे छोड़कर बाकी सब सिलेक्ट हो गए थे

मैंने क्रिकेट इसलिए चुना क्योंकि पढ़ाई पसंद नहीं थी। फुटबॉल इसलिए छोड़ा क्योंकि वो कुछ घंटों का खेल होता है और उसके बाद फिर से पढ़ाई में लगना पड़ता था। मुझे लगता है कि मैं सीरियस तब हुआ, जब मैं हरियाणा स्कूल के लिए ट्रायल देने गया। मेरे साथ गए सात-आठ बच्चों में मुझे छोड़कर सब सिलेक्ट हो गए थे। मुझे बहुत बुरा लगा। उस वक्त स्कूल रोज एक या दो नई गेंद प्रैक्टिस के लिए देता था। जब सारे सीनियर चले जाते थे तो स्कूल वाले मुझे नई गेंद अभ्यास करने के लिए देते थे क्योंकि मैं बाकियों से लंबा और चौड़ा था। सिलेक्शन न होने की वजह से मुझमें इतना गुस्सा भर गया था कि तीन-चार बल्लेबाजों को तो मैंने अभ्यास के दौरान हॉस्पिटल भेज दिया। मैं गुस्सा था क्योंकि सब मुझे छोड़कर चले गए थे। हालांकि, एक साल से भी कम समय में मुझे दिल्ली में होने वाले टूर्नामेंट के लिए सीनियर स्टेट टीम में मुख्य तेज गेंदबाज के रूप में चयनित कर लिया गया। यही मेरे जीवन का टर्निंग प्वाइंट था।

सबसे ज्यादा बदलाव मैंने नवजोत सिंह सिद्धू में देखा

अगर अब तक मैंने किसी क्रिकेट खिलाड़ी में सबसे बड़ा बदलाव देखा है तो वह हैं नवजोत सिंह सिद्धू। वह बहुत अच्छे थे। हम अक्सर उनके घर रुका करते थे। शैरी और नवजोत सिंह सिद्धू 24 घंटे अपना जूड़ा पकड़कर किताबें पढ़ते रहते थे। मुझे लगता था कि वह बहुत शर्माता था पर अब जब वह बोलना शुरू करता है तो मैं विश्वास ही नहीं कर पाता हूं। 

नहीं पता था कि सचिन क्रिकेट का भगवान हो जाएगा

सचिन को मैंने पहली बार ब्रेबॉन स्टेडियम में देखा था। वह 15 साल का रहा होगा। मैं प्रैक्टिस खत्म करके आया था और राज भाई मेरे पीछे पड़े थे कि इस बच्चे को कुछ गेंद डाल दो, वो बहुत अच्छा खेलता है। मैंने उसे दो-तीन गेंद नॉर्मली डालीं। उसके बाद मुझे लगा कि यह खेल सकता है। फिर मैंने उसे तेज गेंद डाली तो उसने तुरंत शॉट मार दिया। मैंने कहा कि यह बच्चा अच्छा है। हालांकि, मैंने कभी नहीं सोचा था कि वह इतनी क्रिकेट खेलेगा और क्रिकेट का भगवान हो जाएगा।

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Published 13 Jul 2019, 14:54 IST
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