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वर्ल्ड कप 2019 : इन पांच पहलुओं पर खरा उतरकर ही भारत बनेगा विश्व चैंपियन

98   //    24 Jul 2018, 02:30 IST

विश्व कप शुरू होने में अब एक साल से भी कम समय रह गया है। सभी दस टीमें अपनी ओर से तैयारी में जुट गई हैं। भारत भी विश्व कप के लिए टीम तैयार करने में लगा है। इस बार विश्व कप उसी सरजमीं पर खेला जाएगा जहां से 2017 में पाकिस्तान के खिलाफ हार के बाद भारतीय टीम चैंपियंस ट्रॉफी गंवाकर लौटी। उसी टूर्नामेंट में भारत को श्रीलंका ने भी सात विकेट से करारी शिकस्त दी थी। हालांकि उस हार को भुलाकर टीम इंडिया आगे बढ़ चुकी है। अपने शानदार खेल की बदौलत वह इंग्लैंड में होने वाले अगले विश्व कप का दावेदार भी है लेकिन उसे 2019 में उतरने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखाना होगा और उसमें सुधार के बाद ही टीम खिताब तक का सफर तय कर सकती है।


  1. 2007 से 2011 के दौर को भूल जाएं तो भारतीय बल्लेबाज हर बड़े टूर्नामेंट में धोखा दे जाते हैं। अगर विराट कोहली को छोड़ दिया जाए तो कोई भी बल्लेबाज ऐसा नहीं है जिस पर आंख बंद कर के भरोसा किया जाए। अब जरा आंकड़ों पर नजर दौड़ाते हैं। 2014 के बाद से दो बड़े टूर्नामेंटों के सेमी फाइनल में भारत की बल्लेबाजी फिसड्डी साबित हुई है। पहला विश्व कप 2015 का सेमी फाइनल और दूसरा टी-20 विश्व कप का सेमी फाइनल मुकाबला। वहीं दो फाइनल मुकाबले में भी भारत खिताब जीतते-जीतते रह गया। इसमें 2014 का टी-20 विश्व कप और 2017 का चैंपियंस ट्रॉफी शामिल है। बड़े टूर्नामेंटों में भारत का हाल भी ठीक इंग्लैंड के फुटबॉल टीम की तरह है जिसके खिलाड़ी लीगों में तो उम्दा खेलते हैं लेकिन मुख्य टूर्नामेंट में फेल हो जाते हैं

  2. भारत के फेल होने का मुख्य कारण है उसके टॉप खिलाड़ियों का फुस्स हो जाना। ऊपर दिए गए चार मैचों में विराट कोहली ही एकमात्र ऐसे खिलाड़ी रहे जिन्होंने अपने बल्ले से कुछ काम किया। उन्हीं की बदौलत 2014 टी-20 विश्व कप के फाइनल में भारत सम्मानजनक स्कोर तक पहुंच पाया। इस मैच में उन्होंने 58 गेंद में 77 रन की पारी खेली थी। सेमी फाइनल में भी कोहली ने 89 रन बनाए थे। बाकि सभी टॉप के बल्लेबाज फेल ही साबित हुए। आज जिस रोहित शर्मा को टीम में सलामी बल्लेबाज के तौर पर पक्की जगह मिली हुई है उन्होंने ने भी कुछ खास नहीं किया। आज भी उनकी हालत कुछ ऐसी ही है। चार मैचों के बाद एक अच्छी पारी खेल कर वे अपनी जगह तो बचा लेते हैं लेकिन इसके कारण भारतीय टीम को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। 2015 विश्व कप के सेमी फाइनल मुकाबले में भी रोहित ने लचर बल्लेबाजी की थी। उन्होंने 48 गेंद में महज 34 रन बनाए थे। हालांकि सिर्फ रोहित को ही दोष दें ये ठीक नहीं, और भी कई बल्लेबाज थे जिन्होंने अपने हाथ खड़े कर दिए थे।

  3. कहा जाता है कि किसी भी मनुष्य का पेट ठीक है तो उसे कोई बीमारी नहीं हो सकती। ठीक उसी तरह किसी भी टीम के पास अगर मध्यक्रम में मजबूत बल्लेबाज हों तो वे किसी भी स्कोर को चेज करने का मद्दा रखती है। भारत का मध्य क्रम चरमराया हुआ नजर आता है। जिस मैच में ऊपर के चार बल्लेबाज रन बनाते हैं, टीम जीत हासिल करने में कामयाब हो जाती है लेकिन अगर वे फेल हुए तो स्थिति दयनीय हो जाती है।

  4. भारतीय टीम को अब ज्यादा से ज्यादा नए चेहरे को मौका देने पर जोर देना चाहिए। विराट खुद ही काफी युवा हैं और वो जिस प्रारूप में धमाल मचाकर राष्ट्रीय टीम में पहुंचे हैं, उन्हें वहां से ज्यादा से ज्यादा प्रतिभावों को मौका देना चाहिए। सौरव गांगुली इसी के लिए जाने जाते थे। कोहली को इंडियन प्रीमियर लीग के साथ ही जूनियर टीम के उन खिलाड़ियों को टीम में लाना चाहिए जो विदेशी पिच पर अच्छा कर रहे हैं। उन्हें अभी से मौका दिया गया तो शायद 2023 तक वे ही सितारे भारत को रोशन करेंगे।

  5. भारतीय टीम के गेंदबाजी पर भी काफी काम करने की जरूरत है। भारतीय प्रबंधन और विराट को भले ही यह लगता हो कि अभी जिस तरह का गेंदबाजों का पूल उनके पास है, उसके दम पर वे किसी टीम को चुनौती दे सकते हैं लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि आज के व्यस्त माहौल में क्रिकेटर को जितना खेलना पड़ता है उससे उनके चोटिल होने का खतरा भी बढ़ जाता है। अगर ऐसा हुआ कि 2019 विश्व कप से पहले जसप्रीत बुमराह और भुवनेश्वर को चोट लग जाती है तो क्या वे उमेश यादव और शार्दुल या अन्य जिसे वे कुछ मैचों में खेला कर बाहर कर रहें हैं, उसके सहारे खिताब तक का सफर तय कर लेंगे। दरअसल, भारत को ए टीम और बी टीम के कॉन्सेप्ट पर काम करने की सख्त जरूरत है। किसी भी बड़े टूर्नामेंट में अगर ए टीम का कोई खिलाड़ी खेलने में सक्षम नहीं है तो उसी की तरह कोई दूसरा उसकी जगह ले सके।


 

ANALYST
संदीप भूषण राष्ट्रीय अखबार जनसत्ता में खेल पत्रकार के तौर पर कार्यरत हैं। इससे पहले वह दैनिक जागरण में भी काम कर चुके हैं। इनके क्रिकेट और हॉकी के साथ ही कबड्डी, फुटबॉल और कुश्ती से जुडे कई लेख राष्ट्रीय अखबारों में छप चुके हैं।
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