भारत और वेस्टइंडीज के बीच अतीत में खेले गए मुकाबलों के 5 प्रतिष्ठित क्षण

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भारत और वेस्टइंडीज ने हमेशा ही क्रिकेट की बहुत अमीर विरासत साझा की है। दोनों ही देशों में खेल के जूनूनी समर्थक हैं और इतने वर्षों में देशों ने महान खिलाड़ी विश्व को दिए हैं। दोनों ही देश एक-दूसरे का सम्मान करते है और अपने विरोधी टीम के खिलाड़ियों की अहमियत को बखूबी समझते हैं। वेस्टइंडीज जब भी किसी मुश्किल में रहा तो उसे भारत के रूप में अच्छा साझेदार मिला। भारत में वेस्टइंडीज के खिलाड़ियों की लोकप्रियता का अंदाजा भी इससे लग जाता है कि भारत में लोग वेस्टइंडीज की परंपरा को स्वीकारने लगे हैं। हालांकि, यह साझा दोस्ती तब कभी एक राह पर नहीं चल सकी जब बात क्रिकेट मैदान पर व्यापार की हो। इतने वर्षों में दोनों ही देशों के बीच कुछ यादगार और प्रतिष्ठित मैच खेले गए हैं, जो प्रशंसकों के दिलों में आज भी ताजा हैं। चूकी भारतीय टीम अभी कैरीबियाई द्वीप पर टेस्ट सीरीज खेलने की तैयारी कर रही है, तब तक हम उन पांच प्रतिष्ठित टेस्ट मैच और पलों पर ध्यान देते हैं, जिसे अधिकांश लोग जानने के लिए उत्सुक जरुर रहेंगे : #1) 1971 की जीत यह जीत भारतीय क्रिकेट के लिए हर मायनों में बहुत महत्त्वपूर्ण रही। यह जीत भारत की वेस्टइंडीज में पहली सीरीज जीत थी। यही वही सीरीज थी, जिसमें सुनील गावस्कर ने डेब्यू किया और वेस्टइंडीज के घातक गेंदबाजी आक्रमण के सामने ढेर सारे रन बनाकर विश्व में अपनी ख्याति बनाई। उन्होंने इस सीरीज में चार शतक और एक दोहरा शतक बनाया था। जमैका में पहले मैच में वेस्टइंडीज को फॉलो ओन खेलने के लिए मजबूर करने के बाद भारतीय टीम दूसरे टेस्ट के लिए तैयार थी। पहले टेस्ट में मिली लय का उपयोग भारत ने दूसरे टेस्ट में भी जारी राखी और त्रिनिदाद एंड टोबागो में दूसरे टेस्ट के पहले दिन मेजबान टीम को 214 रन पर ऑलआउट कर दिया। दिलीप सरदेसाई और सुनील गावस्कर की शानदार पारियों की बदौलत भारत ने 138 रन की बढ़त हासिल कर ली। इसके बाद श्रीनिवास वेंकटराघवन (5 विकेट) की शानदार गेंदबाजी के दम पर भारत ने वेस्टइंडीज की दूसरी पारी 261 रन पर समेट दी। 124 रन के आसान लक्ष्य का पीछा करने उतरी मेहमान टीम ने एक दिन शेष रहते हुए मैच जीत लिया। सुनील गावस्कर ने विजयी चौका जमाया, वह 67 रन पर नाबाद रहे। भारत ने इस बढ़त को बरकरार रखा और 5 मैचों की टेस्ट सीरीज 1-0 से जीती। #2) 1997 में बारबाडोस में ताश के पत्तों की तरह बिखरी भारतीय पारी bishop-1468568099-800 अगर 1971 की जीत ऐतिहासिक थी तो 1997 की यह हार शर्मनाक थी। बारबाडोस की हरी पिच पर वेस्टइंडीज की पहली पारी 298 रन पर सिमटी थी। जवाब में भारत ने 319 रन बनाए और अपनी स्थिति सुखद कर ली। अबे कुरूविला की अगुवाई में भारतीय तेज गेंदबाजों ने मेजबान टीम को दूसरी पारी में 140 रन के मामूली स्कोर पर ऑलआउट कर दिया। भारत को जीत के लिए 120 रन का आसान लक्ष्य मिला। मगर तभी वेस्टइंडीज के गेंदबाजी आक्रमण ने पारी में नियंत्रण पाया और भारतीय पारी ताश के पत्तों की तरह बिखर गई। इयन बिशप ने 4, कर्टली एम्ब्रोस ने तीन और फ्रेंक्लिन रोज ने तीन विकेट लेकर मेहमान टीम को दूसरी पारी में 81 रन से हरा दिया। इस हार का प्रभाव ऐसा रहा कि सचिन तेंदुलकर जो उस टीम के कप्तान थे, ने अपनी ऑटोबायोग्राफी में इसका अलग से उल्लेख किया। तेंदुलकर ने अपनी बुक प्लेइंग ईट माय वे में लिखा, 'सोमवार 31 मार्च 1997 भारतीय क्रिकेट के इतिहास का काला दिन था और मेरी कप्तानी का सबसे खराब दिन।' #3) अनिल कुंबले ने टूटे जबड़े के साथ गेंदबाजी की jumbo-jaw-1468568946-800 इस मुकाबले में कोई रोमांच नहीं था, क्योंकि पिच पूरी तरह बल्लेबाजों के लिए मददगार थी। यह मैच ड्रॉ रहा और दोनों टीमों ने बल्लेबाजी का भरपूर लुत्फ उठाया। हालांकि यह मैच अनिल कुंबले और उनके धैर्य व दृढ़ संकल्प के लिए हमेशा याद किया जाता है। लेग स्पिनर को मर्विन डिल्लन की बाउंसर लग गई थी, जिसके बाद उनके जबड़े से खून बहने लगा था। फिर उनके मुहं पर बैंडेज लगाई गई। हालांकि, इससे उनका ध्यान भटका नहीं और वह चेहरे पर पट्टी लगाकर खेलने उतरे। कुंबले ने लगातार 14 ओवर किए और ब्रायन लारा का विकेट भी लिया। विव रिचर्ड्स ने बाद में कहा, 'मैंने मैदान पर सर्वश्रेष्ठ बहादुरी कारनामों में से एक देखा।' अब सबको उम्मीद है कि वर्तमान भारतीय कोच अनिल कुंबले यही जज्बा खिलाड़ियों के अंदर पैदा करेंगे। #4) मुंबई का ड्रॉ टेस्ट ash-1468569051-800 क्रिकेट में ड्रॉ मैच का ही अलग ही मजा है और टेस्ट क्रिकेट में ही इसका सम्मान अधिकांश साझा होता है, लेकिन बिना ड्रामा और उत्सुकता के यह मुमकिन नहीं। आर अश्विन ने पूरी सीरीज में शानदार प्रदर्शन किया और जब भारत को बहुत जरुरत थी, तब उन्होंने फिर अहम जिम्मेदारी निभाई। भारत को आखिरी दो गेंदों पर टेस्ट जीतने के लिए दो रन की जरुरत थी और उनका एक विकेट शेष था। ऑफ स्पिनर ने पहले पारी में शतक जमाया था और भारत के लिए मैच सुरक्षित करने के लिए पांचवी गेंद ब्लॉक कर दी। अगली गेंद पर अश्विन ने लांग ऑन की दिशा में शॉट खेलकर दो रन लेने की कोशिश की, लेकिन वह दूसरा रन दौड़ते समय रनआउट हो गए। स्कोर बराबर हो गए और मैच ड्रॉ हो गया। क्रिकेट के इतिहास में सिर्फ दो ही टेस्ट बराबर स्कोर पर ड्रॉ हुए हैं। #5) मुंबई में सचिन तेंदुलकर का विदाई मैच sachin-tendulkar-india-vs-west-indies-2nd-test-mumbai-2-1468569258-800 क्रिकेट जगत एक तरह से ठहर गया था, क्रिकेट के भगवान माने जाने वाले सचिन तेंदुलकर ने 200 टेस्ट के बाद खेल से संन्यास लेने की ठान ली। भावनाओं से सराबोर वानखेड़े स्टेडियम पर विपक्षी टीम वेस्टइंडीज ही थी। भारत ने तीन दिन के भीतर एक पारी और 126 रन से मैच जीत लिया। सचिन तेंदुलकर ने विदाई भाषण इतना भावपूर्ण अंदाज में दिया कि विश्व भर में मौजूद उनके प्रशंसकों की आंखे नम हो गई। मास्टर ब्लास्टर आखिरी बार भारतीय टीम की जर्सी में मैदान पर थे, वह जब बहार जा रहे थे तो उनकी आंखे भी नम थी और पूरा स्टेडियम सचिन...सचिन... के नारों से गूंज रहा था। भारत ने यह सीरीज 2-0 से जीती और सचिन युग का शानदार अंत हुआ।

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