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एम एस धोनी, 'द अनटोल्ड स्टोरी': एक फ़िल्म जो है भावनाओं और हक़ीकत के बीच का मिश्रण

Syed Hussain
ANALYST
Modified 11 Oct 2018, 14:12 IST
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महेंद्र सिंह धोनी, भारतीय क्रिकेट इतिहास के सफलतम कप्तानों में शुमार इस खिलाड़ी पर बनी बायोपिक एम एस धोनी, द अनटोल्ड स्टोरी शुक्रवार को सिनेमाघरों में रिलीज़ हो गई। धोनी की करिश्माई छवि किसी से छिपी नहीं है और इसी को भुनाने के मक़सद से निर्माता-निर्देशक नीरज पांडे ने धोनी की ज़िंदगी पर ये फ़िल्म बनाई। हालांकि, बायोपिक में जिन बारीकियों का ध्यान रखना चाहिए, वहां नीरज पांडे से थोड़ी चूक हुई है। या फिर धोनी ने उनके साथ बैठकर ये तय किया होगा कि फ़िल्म किस चीज़ को कैसे और कितना दिखाना चाहिए। लेकिन फिर भी जिस अंदाज़ में धोनी की ज़िंदगी के अनछुए और अनसुने पहलुओं को नीरज पांडे ने दिखाने की कोशिश की है, वह लाजवाब है। मसलन एक क्रिकेट प्रेमी ये तो जानता है कि धोनी ने कब और कैसे भारत का नाम रोशन किया है, लेकिन शायद ही उसने ये जाना था कि धोनी कभी रेलवे में टीसी भी रहे हैं, या धोनी को क्रिकेट में रूची नहीं थी, या साक्षी से पहले धोनी का प्यार कोई और था। धोनी का नाम आते ही क्रिकेट प्रेमियों के ज़ेहन में 2011 विश्वकप क्रिकेट फ़ाइनल याद आ जाता है, जहां धोनी ने छक्के के साथ भारत को 28 साल बाद वर्ल्डकप चैंपियन बनाया था। फ़िल्म की शुरुआत भी वहीं से होती है, धोनी तभी के कोच गैरी कर्स्टन को कहते हैं कि अब बल्लेबाज़ी के लिए मैं जाउंगा, क्योंकि मुरलीधरण गेंदबाज़ी कर रहा है और युवराज उनके सामने असहज खेलते हैं। फ़िल्म में ये सीन देखते ही दर्शकों में जोश भर जाता है, और मुंबई के वानखेड़े की तरह ही सिनेमा घरों में भी धोनी धोनी की गूंज सुनाई देने लगती है। इसके बाद फ़िल्म 30 साल पीछे जाती है जब रांची के अस्पताल में 7 जुलाई 1981 को महेंद्र सिंह धोनी का जन्म होता है। धोनी के पिता पान सिंह धोनी का किरदार अनुपम खेर ने बेहतरीन अंदाज़ में निभाया है। यहां से धोनी के क्रिकेट करियर के सफ़र की शुरुआत को बेहद संजीदगी से दिखाया जाता है। हर एक छोटी छोटी चीज़ों पर ध्यान दिया गया है, जिसमें नीरज पांडे माहिर हैं। इस सफ़र के दौरान कई बातों के बारे में क्रिकेट प्रेमियों को जानकारी मिलती है जैसे कि धोनी को क्रिकेट खेलना पसंद नहीं था। वह एक गोलकीपर थे, स्कूल में विकेटकीपर की जगह ख़ाली रहती है इसलिए धोनी को इसके लिए चुना जाता है। धोनी का सबसे मशहूर ‘हेलिकॉप्टर शॉट’ उन्होंने अपने दोस्त संतोष से सीखा, जिसे उनका दोस्त ‘स्लैप शॉट’ कहता था। इसके बदले में धोनी ने संतोष को समोसे की पार्टी दी थी। धोनी के किरदार को सुशांत सिंह राजपूत ने बेहद करीने से निभाया है, उनके शॉट्स देखकर ऐसा लगता है जैसे कोई क्रिकेटर ही खेल रहा हो। सुशांत ने अपने करियर की सबसे बेहतरीन अदाकारी की है और इस रोल के साथ न्याय किया है। आमूमन ऐसा देखा जाता है कि बायोपिक में दर्शक या तो बोर होने लगते हैं या फिर फ़िल्म धीमी हो जाती है। लेकिन नीरज पांडे ने इस बात का ध्यान रखते हुए बीच बीच में कुछ ऐसे सीन डाले हैं जो दर्शकों को बांधे रखते हैं और उन्हें तालियां और सीटियां बजाने का मौक़ा भी देती हैं। धोनी के परिवार की आर्थिक हालत बहुत ज्यादा अच्छी नहीं थी। एक ऐसे परिवार का मुखिया यही सोचता है कि उसका बेटा पढ़ लिख कर सरकारी नौकरी हासिल कर ले। पान सिंह धोनी भी यही चाहते थे और माही खेल में कुछ करना चाहता था। पिता खिलाफ नहीं थे, लेकिन एक आम पिता का डर उनके मन में मौजूद था। अपने पिता की खातिर धोनी रेलवे में टीसी की नौकरी करते हैं। टीसी की नौकरी में धोनी के डिप्रेशन को अच्छे से दिखाया गया है जब वह पूरा दिन रेलवे प्लेटफॉर्म पर दौड़ते हैं और शाम को मैदान में पसीना बहाते हैं। अपनी इस कुंठा को दूर करने के लिए धोनी टेनिस बॉल टूर्नामेंट भी खेलते हैं, और एक दिन टीसी की नौकरी को छोड़ देते हैं। अंडर-19 चयन से लेकर भारत-ए के लिए खेलने से पहले तक धोनी कैसे राजनीति का शिकार भी हुए हैं वह भी इस फ़िल्म में दिखाया गया है। दिलीप ट्रॉफ़ी का एक मैच धोनी कैसे सिर्फ़ इसलिए नहीं खेल पाए थे क्योंकि उन्हें इसकी जानकारी देर से मिली थी, उसे भी इस फ़िल्म में शानदार अंदाज़ में दिखाया गया है। पहले हाफ़ तक फ़िल्म काफ़ी अच्छी रही है, दूसरे हाफ़ में थोड़ा मसाला भी डालने की कोशिश की गई है। कुछ सीन्स पचते नहीं हैं, जैसे भारतीय क्रिकेट टीम में आने के बाद फ्लाइट में सफ़र करते हुए धोनी के ठीक बग़ल में एक आम लड़की बैठ जाती है जबकि दूसरे क्रिकेटर्स कहीं और बैठे होते हैं। ये दिशा पटानी होती हैं, जो धोनी की पहली गर्लफ़्रेंड प्रियंका झा का किरदार निभा रही हैं जहां से धोनी और उनके बीच प्यार की शुरुआत होती है। हालांकि फ़िल्म में दिखाया गया है कि प्रियंका और उनकी मुलाक़ात 2005 में हुई थी और 2006 में प्रियंका की एक सड़क हादसे में मौत हो जाती है, जबकि ख़बरों की मानें तो प्रियंका और धोनी का प्यार उनके भारतीय क्रिकेट टीम में आने से बहुत पहले की बात है। और उनकी मौत 2002 में ही हो गई थी। इसके बाद धोनी को दूसरा प्यार साक्षी से होता है, इस किरदार को किआरा आडवाणी ने निभाया है। उन्होंने भी इस भूमिका के साथ न्याय किया है। भारतीय क्रिकेट प्रेमी और धोनी के फ़ैन्स को इस फ़िल्म से उम्मीद थी कि आख़िर ड्रेसिंग रूम के अंदर क्या होता होगा? धोनी और युवराज के बीच क्या सही मायनों में लड़ाई हुई थी ? धोनी किस तरह से बतौर कप्तान अपनी रणनीति बनाते थे? करोड़ों उम्मीद का तनाव 'कैप्टन कूल' किस तरह झेलते थे? अपने खिलाड़ियों के साथ किस तरह व्यवहार करते थे? उन्हें क्या टिप्स देते थे? सीनियर खिलाड़ियों को कैसे नियंत्रित करते थे? उन्होंने अचानक ऑस्ट्रेलियाई दौरे के बीच में टेस्ट क्रिकेट को क्यों अलविदा कह दिया? क्या उन पर किसी किस्म का दबाव था? लेकिन फ़ैन्स को इन सवालों के जवाब नहीं मिलते हैं। यहां तक कि फ़िल्म के टीज़र में बोले गए एक डायलोग को फ़िल्म से हटा दिया गया है। धोनी जब अपने पसंद की टीम चुनना चाहते हैं तो चयनकर्ता आपस में बात करते हुए कहते हैं कि आज ये उन्हें ही हटाना चाह रहा है जिन्होंने इसे आगे बढ़ाया था। लेकिन फ़िल्म में आपको ये डायलोग नहीं मिलेगा। साथ ही फ़िल्म में ये सस्पेंस बना रहता है कि धोनी कौन से तीन सीनियर खिलाड़ियों को टीम से बाहर करना चाहते थे, इसका भी जवाब नहीं मिल पाया। एक और चीज़ जो हैरान करने वाली है वह ये कि धोनी के भाई नरेंद्र सिंह धोनी का फ़िल्म में कहीं कोई ज़िक्र नहीं है। फ़िल्म में धोनी (सुशांत सिंह राजपूत) और उनकी बहन (भूमिका चावला) का किरदार प्रभावशाली रहा है। अभिनय के मामले में सुशांत सिंह राजपूत का जवाब नहीं है, पहले ही फ्रेम से सुशांत धोनी दिखाई देने लगते हैं। अगर सुशांत की जगह कोई नामी सितारा होता तो शायद उन्हें धोनी के रूप में देखना कठिन होता। सुशांत ने बॉडी लैंग्वेज में भी धोनी की छाप छोड़ जाते हैं। फ़िल्म की एडिटिंग भी बेहतरीन है, मैचों की क्लिपिंग में जिस अंदाज़ में खिलाड़ियों के साथ सुशांत सिंह राजपूत नज़र आते हैं, वह बिल्कुल असली मालूम पड़ता है। फ़िल्म के आख़िर में महेंद्र सिंह धोनी भी नज़र आए हैं, और उनके आते ही सिनेमाघरों में तालियों की गड़गड़ाहट और सीटियां बजने लगती हैं। कुल मिलाकर धोनी के आलोचकों से लेकर प्रशसंकों तक को ये फ़िल्म ज़रूर देखनी चाहिए, धोनी के फ़ैंस जहां इसे देखकर ख़ुश होंगे वहीं उनके आलोचकों को धोनी की ज़िंदगी को समझने और उनके यहां तक के सफ़र को देखने के बाद एक अलग अहसास अवश्य होगा। फिल्म में धोनी की ज़िंदगी से जुड़ी कुछ बातों का उल्लेख भले ही न हो, लेकिन फ़िल्म देखने लायक़ है। Published 01 Oct 2016, 09:00 IST
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