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वनडे क्रिकेट इतिहास में नियमों में बदलाव के बाद वे नियम जो अब मान्य नहीं

ANALYST
Modified 13 Feb 2018, 18:50 IST
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साल 1983 तक एकदिवसीय क्रिकेट फॉर्मेट 120 ओवर का हुआ करता था। इसमें 60-60 ओवर प्रति पारी निर्धारित किए गए थे। लेकिन बाद में इसे घटाकर 50 ओवर प्रति पारी कर दिया गया। वनडे क्रिकेट को ज्यादा लोकप्रिय बनाने के लिए इसमें कई बदलाव भी किए गए। जिसके कारण समय-समय पर वनडे क्रिकेट के नियमों को भी बदला गया। वनडे क्रिकेट का लोगों में आकर्षण बनाए रखने के लिए मैदान में फील्डिंग संबंधित कई प्रतिबंध भी लगाए गए। इसके अलावा आईसीसी की होने वाली बैठकों में भी इस प्रारूप के नियमों से संबंधित बहुत चर्चाएं भी हुई। वर्तमान में क्रिकेट के 50 ओवर के फॉर्मेट में पहला पॉवर प्ले 10 ओवरों की शुरुआती अवधि में लेना होता है। इस दौरान आंतरिक क्षेत्र के बाहर अधिकतम 2 फील्डर रखे जाने की अनुमति होती हैं। इसके बाद दूसरा पॉवर प्ले 11वें ओवर से लेकर 40वें ओवर तक लेना होता है, जिसमें अधिकतम 4 फील्डर्स को सर्कल से बाहर रखे जाने की अनुमति दी जाती है। तीसरा और अंतिम पॉवर प्ले मैच के 41वें ओवर से लेकर 50 वें ओवर तक लेना होता है, जिसमें अधिकतम 5 फील्डर्स को सर्कल से बाहर रखे जाने की अनुमति होती है। वनडे क्रिकेट में कई बदलाव हो चुके हैं और कई बदलाव वर्तमान में भी हो रहे हैं। जिस तरह से बदलाव हो रहे हैं उसे देखते हुए ये कहना भी गलत नहीं होगा कि वर्तमान के नियम भी ज्यादा लंबे समय तक नहीं टिक पाएंगे। वनडे में इन नियमों के कारण फील्डिंग कर रहे कप्तान को बहुत से निर्देशों का पालन भी करना होता है, जिसके चलते कई बार कप्तान को निर्णय लेने में भी कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है। हालांकि आईसीसी एक विशेष पैटर्न के तहत ही वनडे मैच को खिलवाना चाहता है। वनडे क्रिकेट में कई नियम ऐसे भी जो अब रद्द किए जा चुके हैं और अब उन नियमों को किसी प्रकार की कोई मान्यता नहीं है। जान लीजिए उन नियमों के बारे में जो अब एकदिवसीय मैचों में अब मान्य नहीं हैं।

#1 सुपर-सब नियम

  सुपर-सब नियम की शुरुआत साल 2005 में हुई थी। सुपर-सब नियम की अवधारणा यह थी कि प्रत्येक टीम एक सब्सिट्यूट खिलाड़ी चुन सकती थी। इसका निर्णय कप्तान टॉस से पहले लेता था। सब्सिट्यूट खिलाड़ी या फिर कहें की टीम का 12वां खिलाड़ी बल्लेबाजी, गेंदबाजी और विकेटकीपिंग सब कुछ कर सकता था। हालांकि, जिस खिलाड़ी के जगह पर सब्सिट्यूट खिलाड़ी आता था, वो दोबारा मैच में शामिल नहीं हो सकता था। उदाहरण के तौर पर, यदि प्रतिस्थापित खिलाड़ी को बदलने से पहले वो बल्लेबाजी कर चुका है तो उसका सब्सिट्यूट खिलाड़ी सिर्फ गेंदबाजी ही कर सकता था। वहीं अगर प्रतिस्थापित खिलाड़ी 2 ओवर की गेंदबाजी कर चुका है तो सब्सिट्यूट खिलाड़ी बाकि के बचे 8 ओवर की गेंदबाजी ही कर सकता था। यह नियम बहुत कम समय के लिए लागू रहा क्योंकि टॉस जीतने वाली टीम के लिए ये नियम काफी फायदेमंद साबित होता था। बाद में इस नियम को रद्द कर दिया गया। ये नियम काफी हद तक फुटबाल और हॉकी से प्रभावित था। इस नियम के तहत विक्रम सोलंकी क्रिकेट में पहले सुपर-सब बने थे।
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Published 13 Feb 2018, 18:50 IST
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