आख़िर समय के साथ क्यों घट जाती है भारतीय तेज़ गेंदबाज़ों की रफ़्तार ?

भारतीय क्रिकेट को हमेशा से एक अदद तेज गेंदबाज की कमी खलती रही है। हाल के दिनों में शिवम मावी और कमलेश नागरकोटी जैसे गेंदबाजों ने उम्मीद जगाई लेकिन मन में एक सवाल को भी जन्म दे दिया। सवाल यह कि ये रफ्तार के सौदागर भी कहीं भारतीय कोचों की संगत में कुंद तो नहीं पड़ जाएंगे? इतिहास में झांक कर देखें तो कई गेंदबाजों ने समय-समय पर अपनी रफ्तार से प्रभावित किया लेकिन समय के साथ उनकी गेंदबाजी ने या तो रफ्तार खो दी या तेज धार। इसमें इशांत शर्मा, उमेश यादव, इरफान पठान, प्रवीण कुमार और मोहम्मद शमी जैसे दमदार गेंदबाज दनदनाती रफ्तार के साथ भारतीय टीम में शामिल हुए और धीरे-धीरे या तो अपनी रफ्तार घटा ली या वो लाइन कायम नहीं रख सके जिसके लिए उन्हें जाना गया।

गेंदबाज क्यों घटाते हैं अपनी रफ़्तार

दरअसल, भारतीय टीम की कमजोर कड़ी उनकी गेंदबाजी को माना जाता है। हालांकि इसके पीछे एकमात्र कारण उसके पास तेज गेंजबाजों की कमी है। विदेशी पिचों पर मैच खेलते हुए भारतीय गेंदबाज फ्लॉप साबित होते हैं। वो उस तरह की रफ्तार और बाउंसर नहीं फेंक पाते जो डेल स्टेन और मिचेल जॉनसन आसानी से फेंक लेते हैं। दिग्गजों के मुताबिक भारतीय क्रिकेट में कोचों की सबसे बड़ी कमी रही है कि वह अपने घरेलू पिच के मुताबिक ही टीम का चयन करते हैं और उसे कोचिंग देते हैं। इसका नुकसान उन्हें गेंदबाजों की बली देकर उठाना पड़ता है। जब कोई खिलाड़ी टीम में शामिल होता है तो उसे रफ्तार से ज्यादा लाईन और लेंथ ठीक करने की ट्रेनिंग दी जाती है। यही कारण है कि ज्यादातर खिलाड़ी अपनी रफ्तार गंवा देते हैं।

भारतीय माहौल में फ़िट लेकिन विदेशों में अनफ़िट

भारत की ज्यादातर पिच विदेशों के मुकाबले धीमी होती है। साथ ही यहां उछाल कम होता है। स्पिनरों को खेलना भारतीय बल्लेबाजों को जमाने से रास आता है इसी कारण सूखी पिच भी बनाई जाती है। इसका नतीजा होता है कि तेज गेंदबाजों को मदद कम मिलती है और वे भी स्पिनरों जैसी गेंद करने के अभ्यास में लग जाते हैं। वही गेंदबाज जब विदेशी पिच पर जाता है तो हरियाली पिच उसे खुश तो करती है लेकिन उसकी रफ्तार यहां उसे धोखा दे जाती है। मतलब कि बेहतरीन हुनर के बाद भी वो उस सफलता को हासिल नहीं कर पाता जिसका वो हकदार है। इसका ताजा उदारण अंडर-19 विश्व कप है जो इंग्लैंड की सरजमीं पर खेला गया। उस टूर्नामेंट में भारतीय जूनियार टीम के जबाजों ने जमकर कहर बरपाया और रफ्तार के मामले में भी कई विदेशी गेंजबाजों को टक्कर दी। हालांकि इसकी पूरी उम्मीद है कि जब ये भी सीनियर कैंप मे शामिल होंगे तो कोच की सलाह के मुताबिक रफ्तार पर लगाम लगा लेंगे।

रफ़्तार और सटीक गेंदबाज़ी फ़तह की कुंजी

ऐसा नहीं है कि सभी भारतीय गेंदबाज एक ही रास्ते पर चलते हैं और अपनी रफ्तार से समझौता कर लेते हैं। भुवनेश्व कुमार, उमेश यादव, वरुण आरोन और इशांत शर्मा ने कई मौकों पर अपनी रफ्तार से विरोधियों को पस्त किया है लेकिन यह कहना सही नहीं कि हमेशा वो 149 और 150 की रफ्तार से ही गेंदबाजी करते हैं। दिल्ली में क्रिकेट की पाठशाला चलाने वाले ज्यादातर गुरुओं का मानना है कि रफ्तार के साथ सटीक लाइन और लेंथ ही जीत की एकमात्र कुंजी है। भारत से बाहर कई मरतबा आपके सामने मेजबान ऐसी पिच परोसता है जिस पर स्पिनरों के लिए कुछ नहीं होता, तब आपके पास तेज गेंदबाज ही एकमात्र विकल्प होते हैं। ऐसे में भारतीय टीम पिछड़ने लगती है।

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