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स्पोर्ट्सकीड़ा एक्सक्लूसिव: जोश और जज्बे की कहानी अंकुर धामा

SENIOR ANALYST
विशेष
123   //    17 Jan 2019, 14:45 IST

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एशियन पैरा गेम्स 2014 में 3 मेडल जीतने वाले अंकुर धामा की कहानी उनके बुलंद हौसले की दास्तान को बयां करती है। अंकुर ने करीब 10 साल पहले अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था और आज वो पैरा एथलीट्स में एक जाने-माने नाम बन चुके हैं। अंकुर धामा भारत के पहले ऐसे दिव्यांग एथलीट हैं जिन्होंने पैरालंपिक स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व किया। यही नहीं उन्हें अर्जुन अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। ऊषा इंटरनेशनल द्वारा आयोजित ट्रेनिंग प्रोग्राम के दौरान अंकुर ने स्पोर्ट्सकीड़ा से अपने अब तक के पूरे सफर के बारे में खुलकर बात की।

अपने अब तक के पूरे सफर के बारे में बताएं। आप यहां तक कैसे पहुंचे ?

मेरी अब तक की सफलता का पूरा श्रेय मेरे स्कूल को जाता है। अगर मैं यहां पर नहीं आता तो शायद मुझे इन सबके बारे में पता भी नहीं चलता। 2002 में मैं यहां पढ़ने के लिए आया। 2004 में आईबीएसए का नेशनल गेम हो रहा था। उस समय पहली बार मैंने विजुअली चैलेंज्ड एथलीट्स को खेलते हुए देखा, तब लगा कि मुझे भी खेलना चाहिए। उस वक्त मैं 12 साल का हो चुका था। 2007 में मैंने सबसे पहले अपने प्रोफेशनल एथलेटिक्स करियर की शुरुआत की थी। जब पैरालंपिक कमेटी ऑफ इंडिया ने राष्ट्रीय खेलों का आयोजन कराया तो मैंने वहां पर 200 मीटर और 400 मीटर में हिस्सा लिया था और पदक भी जीते थे। इसके बाद 2008 में इंडियन ब्लाइंड स्पोर्टस एसोसिएशन ने एथलेटिक्स मीट का आयोजन कराया जिसमें मैंने दोनों जूनियर रिकॉर्ड (400 मीटर और 800 मीटर) को तोड़ा। 2009 में पहली बार मैं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलने गया। यूएसए में आयोजित वर्ल्ड यूथ स्टुडेंट चैंपियनशिप में मैंने भाग लिया था और वहां पर गोल्ड मेडल भी जीता था।

हमारे खेल मंत्री इस वक्त राज्यवर्धन सिंह राठौड़ हैं जोकि खुद एक खिलाड़ी रह चुके हैं। एक खिलाड़ी जब देश का खेल मंत्री बनता है तो क्या वो खिलाड़ियों की जरूरतों को ज्यादा अच्छे से समझ पाता है ?

जी बिल्कुल फर्क पड़ता है। अगर हमारे मंत्री खेल से संबंधित हैं तो वो उस खिलाड़ी की सभी जरूरतों और परेशानियों को अच्छी तरह से समझते हैं। उन्हें पता होता है कि एक खिलाड़ी की जरूरतें क्या होती है और उनका हौसला किस तरह से बढ़ाया जाता है।

एक चीज जो मैं स्पोर्ट्सकीड़ा के माध्यम से कहना चाहता हूं कि भारत में गाइड रनर (एथलीट के साथ दौड़ने वाला रनर) के लिए कोई नीति नहीं है। इससे टी-11 कैटेगरी (जो एथलीट्स पूरी तरह से गाइड पर ही निर्भर हों) के एथलीट्स को काफी दिक्कतें होती हैं। जैसे नियमित तौर पर एक कोच की नियुक्ति होती है वैसे गाइड रनर की भी होनी चाहिए। उन्हें भी सरकार द्वारा अवॉर्ड दिया जाना चाहिए और सम्मानित किया जाना चाहिए। इससे हमारे जैसे एथलीट्स के प्रदर्शन में काफी सुधारा आएगा।

आपको सरकार की तरफ से अर्जुन अवॉर्ड मिल चुका है, इससे एक खिलाड़ी के मनोबल पर क्या असर पड़ता है ?

ये मेरा ही नहीं बल्कि मुझ जैसे सभी लोगों का सम्मान है। इससे काफी खिलाड़ियों को प्रेरणा मिलेगी जो इस फील्ड में आना चाहते हैं। इससे अन्य पैरा एथलीट्स का भी हौसला बढ़ता है। सबसे बड़ी बात ये कि समाज में लोगों का उनके प्रति नजरिया भी बदलेगा।

एथलेटिक्स में आमतौर पर चीन के खिलाड़ी ज्यादा हावी नजर आते हैं, आपके हिसाब से हमारे यहां अभी ऐसी क्या कमियां हैं जो हम उस स्तर का प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं ?

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सबसे बड़ी बात ये है कि वहां पर जमीनी स्तर से ही खिलाड़ियों को तैयार किया जाता है। हमारे यहां कुछ बुनियादी कमियां रह जाती हैं। लेकिन हाल ही में जो खेलो इंडिया मुहिम शुरू हुई है, इससे आगे चलकर काफी फायदा होगा। इसी तरह से पैरा एथलेटिक्स में भी आयोजन होने चाहिए।

2020 टोक्यो पैरालंपिक के लिए किस तरह की तैयारी चल रही है ?

2020 टोक्यो ओलंपिक के लिए मेरे कोच ने पूरा ट्रेनिंग प्रोग्राम तैयार कर लिया है और मेरी ट्रेनिंग जारी है। इस बीच मुझे कई सारे प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लेना है। उम्मीद है कि मैं एक बार फिर देश का नाम रोशन करुंगा।

आपका पसंदीदा खिलाड़ी कौन है ?

मुझे मोहम्मद फराह और केनेसिया बेकेले काफी पसंद हैं। बेकेले मेरी तरह एक छोटी हाइट वाले खिलाड़ी हैं और उनसे हमें काफी प्रेरणा मिलती है।

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