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Tokyo Olympics - नीरज चोपड़ा की "त्याग गाथा" 

Athletics - Olympics
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जैवलिन थ्रोअर नीरज चोपड़ा ओलंपिक में व्यक्तिगत गोल्ड मेडल जीतने वाले दूसरे भारतीय एथलीट बन गए हैं। नीरज चोपड़ा ने दुनिया सभी एथलीट्स को पछाड़ते हुए सर्वाधिक 87.58 मीटर का भाला फ़ेंका और 'गोल्ड मेडल' जीत कर इतिहास रच डाला। इस ऐतिहासिक जीत के बाद नीरज भारत के "गोल्डेन ब्वॅाय" बन गए हैं

आज पूरा देश नीरज चोपड़ा की उपलब्धि पर ख़ुश है और जश्न मना रहा है। पर बहुत कम लोग इस जीत के पीछे छिपे संघर्ष के बारे में जानते हैं। नीरज चोपड़ा ने सोने का तमगा लेने के बहुत सारे त्याग किये हैं। आपको जान कर हैरानी होगी कि उन्होंने गोल्ड मेडल जीतने के लिये एक साल तक फोन को हाथ नहीं लगाया। यूं मान लीजिये एक साल तक उन्होंने मोबाइल भी नहीं इस्तेमाल किया।

यही नहीं, अगर परिवार से बात करनी होती थी, तो वो ख़ुद ही उनसे बात करते थे। वीडियो कॉल पर वो मां सरोज और अन्य लोगों से बात करते थे। इसके साथ ही सोशल मीडिया से काफ़ी दूर रहते थे। नीरज चोपड़ा का पालन-पोषण संयुक्त परिवार में हुआ है। 19 लोगों के बीच रह कर उन्होंने अपने खेल पर ध्यान दिया और बिना बहाना बनाये हुए आगे बढ़ते रहे।

खेल में आगे बढ़ने के लिये उन्हें वित्तीय सहायता की भी आवश्यकता थी। नीरज को आगे बढ़ाने के लिये सिर्फ़ उनके माता-पिता ही नहीं, बल्कि चाचा ने भी मदद की। सभी ने मिल कर उनका करियर बनाने में मदद की। जेवलिन लेने के लिये नीरज चोपड़ा को करीब 1.5 लाख रुपये की ज़रूरत थी। ऐसे में नीरज चोपड़ा के चाचा और पापा ने मिल कर पैसे जोड़े और उन्हें जेवलिन दिलाया।

2016 में नीरज उस वक़्त सुर्खियों में आये जब उन्होंने विश्व चैंपियनशिप में 86.48 मीटर के अंडर-20 विश्व रिकॉर्ड के साथ गोल्ड मेडल जीता। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। जीत के बाद 2017 में वो सेना से जुड़ गये। इसकी वजह परिवार को वित्तीय मदद पहुंचाना था। उन्होंने कहा था कि वो किसान परिवार से आते हैं। किसी के पास सरकारी नौकरी नहीं है। मुश्किलों में परिवार साथ देता आ रहा है और अब वक़्त आ गया है, जब उन्हें नौकरी करके परिवार की मदद करनी चाहिये।

नीरज ने नौकरी करने के साथ-साथ अपने प्रशिक्षण को भी जारी रखा। इस दौरान नीरज के जीवन में एक नहीं, बल्कि कई समस्याएं थीं। एक समय आया जब उनके पास कोई कोच नहीं था। नीरज ने भी हार नहीं मानी और वीडियो देख-देख कर अपनी कमियां पूरी करते रहे।

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Edited by निशांत द्रविड़
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