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87.5 मीटर से और अच्छा करने की कोशिश थी - नीरज चोपड़ा 

Athletics - Olympics
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टोक्यो ओलंपिक 2020 में नीरज चोपड़ा ने स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया है। नीरज जहां भी जा रहे हैं। वहां उनकी वाह-वाही के कसीदे पढ़े जा रहे हैं। हर कोई नीरज का दिवाना बन गया है। स्पोर्टसकीड़ा हिंदी से खास बात करते हुए नीरज ने अपने स्वर्ण पदक जीतने की कहानी बतायी। हरियाणा का ये छोरा कहता है कि जब उनके आंखों के सामने राष्ट्रगान बज रहा था, वो पल कुछ खास था। वहीं उनसे जब पूछा गया कि क्या पहले ही राउंड में 87.5 मीटर फेंकने का बाद उन्होंने मान लिया था। वो स्वर्ण जीतने वाले हैं। उस पर उनका कहना था कि ऐसा बिल्कुल नहीं था। उनकी दिमाग में हर पल ये बात थी। अपने पहले राउंड से आगे फेंकने की।

वहीं 7 अगस्त को ऐतिहासिक दिन बनाने पर नीरज ने एथलेटिक्स फेडरेशन आफ इंडिया को धन्यवाद दिया। वहीं नीरज के पिता भी अपनी बेटे पर खुश दिखें। उन्होंने अपने बेटे गर्व करते हुए भविष्य में ऐसे ही प्रदर्शन को बरकरार रखने की उम्मीद जतायी है। नीरज पूरे देश के लिए प्रेणाश्र्तोत बन गए हैं। नीरज आज कल कई कार्यक्रम में शिरकत करते हुए दिख रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी समेत देश के कई महानुभाव हर कोई इस देसी छोरे का कायल बन चुका है। नीरज देश और दुनिया में ख्याति प्राप्त खिलाड़ी बन चुके हैं। उनका अगला लक्ष्य विश्व प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतने पर है।

क्रिकेट प्रेमी देश भारत जहां पर इस खेल को धर्म माना जाता है। ऐसे में जैवलिन थ्रो जैसे खेल का डंका सर चढ़ के बोल रहा है। कहीं ना कहीं इसका श्रेय नीरज को बिल्कुल जाता है। अब हर माता-पिता चाह रहा है। उनका लड़का नीरज बने। भारत में जैवलिन थ्रो को लेकर कितनी सुविधा बढ़ेंगी। ये देखने योग्य होगा। टोक्यो ओलंपिक के बाद भारत में खेल सुविधा बेहतर होने वाली है। लेकिन कितनी बेहतर होंगी ये कहना बिल्कुल मुश्किल होगा।

ओलंपिक में साइना नेहवाल और पीवी सिंधू के ओलंपिक में पदक जीतने के बाद ऐसे कयास लगाए जा रहे थे कि इन खेलों का रूप बदल जाएगा, लेकिन उम्मीदनुसार चीजों हो ना सकी। उच्चस्तरीय जगहों पर खेलों को बढ़ावा जरुर मिला है। लेकिन ग्रासरूट पर जिस सुविधा की खिलाड़ियों को जरूरत है। वो अभी बदलने में थोड़ा समय तो जरूर लगेगा। बहरहाल नीरज ने भारत को जो ये उपहार दिया है। उसकी कहानी स्कूली किताबों से लेकर दादी और मां की कहानियों में बच्चों को जरूर सुनने को मिलेगी।

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Edited by निशांत द्रविड़
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