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Tokyo Paralympics - देवेंद्र झाझरिया के बारे में ऐसी बातें जो आप नहीं जानते होंगे

देवेंद्र झाझरिया के नाम पैरालंपिक में रिकॉर्ड दो स्वर्ण पदक हैं
देवेंद्र झाझरिया के नाम पैरालंपिक में रिकॉर्ड दो स्वर्ण पदक हैं
Lakshmi Kant Tiwari

टोक्यो ओलंपिक में भारत को लेकर 100 देश इस प्रतियोगिता में हिस्सा ले रहे हैं। अगर हमारे देश में सर्वश्रेष्ठ दिव्यांग खिलाड़ियों की गिनती करें तो उसमें देवेंद्र झाझरिया का नाम सबसे पहले आता है। इंडिया में आज भी देवेंद्र के बराबर का कोई पैरालंपियन नहीं है। आइए एक नजर उनकी उपलब्धि पर डालते हैं:

1) शुरू से दिव्यांग नहीं थे

देवेंद्र झाझरिया का जन्म 1981 में चुरू,राजस्थान में हुआ था। झाझरिया शुरूआत दिनों से दिव्यांग नहीं थे। झाझरिया जब 8 साल के थे। उस दौरान उन्होंने गलती से नंगी केबल पर हाथ रख दिया था। जिसके बाद डॅाक्टर को उनको दायां हाथ कांटना पड़ा था।

2). राजीव गांधी और अर्जुन पुरस्कार से नवाजे जा चुके हैं

एथेंस पैरालंपिक में पदक जीतने के बाद देवेंद्र झाझरिया को अर्जुन पुरस्कार से नवाजा गया है। वहीं रियो 2016 पैरालंपिक में पदक जीतने के बाद देवेंद्र को राजीव गांधी खेल पुरस्कार से नवाजा गया। हालांकि ये अवॅार्ड उन्हें 2017 में दिया गया था। हरियाणा के इस जैवलीन थ्रोअर ने 2013 और 2015 आइपीसी विश्व प्रतियोगिता में रजत पदक अपने नाम किया था।

3) पहले पैरालंपियन जिन्होंने पद्म श्री अपने नाम किया

देवेंद्र के लगातार बढ़ते ओहदे को लेकर भारत सरकार ने उन्हें 2012 में पद्म श्री से नवाजा। पदम श्री इस देश में चौथा सबसे बड़ा पदक है। ये राजस्थान के ऐसे पहले पैरालंपियन हैं, जिन्हें भारत सरकार की तरफ से इस पुरस्कार से नवाजा गया।

4) F46 कैटेगरी में विश्व रिकॅार्ड होल्डर हैं देवेंद्र

देवेंद्र के नाम F46 में विश्व रिकॅार्ड है। उन्होंने 2004 में 62.15 तो वहीं 2016 में 63.97 तक भाला फेंक नया कीर्तिमान स्थापित किया। जवाहार लाल नेहरू स्टेडियम में ट्रॅायल के दौरान उन्होंने 65.71 तक भाला फेंका था। ऐसे में ये कायास लगाए जा रहे हैं कि वो टोक्यो पैरालंपिक में इससे ज्यादा दूरी तक भाला फेकेंगे।

5) पहले भारतीय पैरालंपियन जिनके नाम 2 पैरालंपिक स्वर्ण पदक है

देवेंद्र झाझरिया एक मात्र पैरा एथलीट हैं, जिनके नाम 2 पैरालंपिक स्वर्ण पदक है। इस साल उनका लक्ष्य पैरालंपिक में तीसरे पदक पर है। कभी हार ना मानने वाले इस खिलाड़ी ने जो संघर्ष किया वो काबिल-ए-तारीफ है।

भारत के दिव्यांग खिलाड़ियों को एक साधारण एथलीट से ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। बावजूद इसके उन्हें वो सब नहीं मिल पाता, जिसके वो असली हकदार हैं। हालांकि इस बार भारत सरकार ने अपना रूख पहला स्पष्ट कर दिया है। वो पैरालंपिक खिलाड़ियों को अन्य खिलाड़ियों की तरह सारी सुविधा देगी जो एक आम भारतीय खिलाड़ी को मिलती है।


Edited by निशांत द्रविड़

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