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रणजी ट्रॉफी का वह फ़ाइनल जब दिलीप वेंगसरकर के छलक आए थे आंसू

Daya Sagar
ANALYST
Modified 21 Sep 2018, 20:25 IST
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रणजी ट्रॉफी का 2017-18 सीजन समाप्त हुआ। कमजोर माने जाने वाली विदर्भ की टीम पहली बार इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट की विजेता बनी। दरअसल पिछले कुछ सालों में रणजी ट्रॉफी में एक अच्छा और सुखद बदलाव आया है और कमजोर माने जाने वाली टीमें भी विजेता बनी है। मुंबई, तमिलनाडु, बंगाल और दिल्ली जैसे राज्यों का वर्चस्व टूटा है और उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और विदर्भ जैसी छोटी माने जाने वाली टीमें विजेता के रूप में उभरकर सामने आई हैं। यह भारतीय क्रिकेट के भविष्य के लिए काफी अच्छा है। आगे आने वाले सीजन में आश्चर्य नहीं होगा अगर केरल और जम्मू कश्मीर जैसी टीमें भारत के इस सबसे बड़े घरेलू टूर्नामेंट की विजेता बने। बहरहाल आज हम बात करेंगे 1990-91 की रणजी ट्रॉफी की जब ऐसे ही एक कमजोर और छोटी माने जाने वाली टीम हरियाणा ने 30 बार की रणजी चैम्पियन मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) को हराया था। इस मैच को रणजी ट्रॉफी इतिहास का सबसे रोमांचक फाइनल माना जाता है। हरियाणा की टीम में उस समय कपिल देव और चेतन शर्मा के रूप में सिर्फ दो ऐसे खिलाड़ी थे जिनको अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का अनुभव प्राप्त था और अजय जडेजा घरेलू क्रिकेट में अभी उभर ही रहे थे। हरियाणा की टीम इससे पहले सिर्फ एक बार 1985-86 के सीजन में फाइनल में पहुंची थी जहां पर उसे दिल्ली की मजबूत टीम ने पारी और 141 रन के बड़े अंतर से हराया था। दूसरी तरफ बॉम्बे की टीम में सचिन तेंदुलकर, दिलीप वेंगसरकर, संजय मांजेरकर और विनोद कांबली समेत कुल 8 ऐसे खिलाड़ी थे जिन्हें अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का अनुभव प्राप्त था। सचिन तेंदुलकर उस समय तक एक स्टार बन चुके थे, जबकि दिलीप वेंगसरकर भारत के सबसे अनुभवी बल्लेबाज थे। इसके अलावा फाइनल मैच बॉम्बे के घरेलू मैदान वानखेड़े स्टेडियम में ही था। कुल मिलाकर अनुभव, रिकॉर्ड और घरेलू समर्थन के आधार पर बॉम्बे का ही पलड़ा भारी था।

नाटकीयता से भरा रणजी सीजन

हरियाणा के लिए यह रणजी सीजन नाटकीयता से भरा हुआ था। दिल्ली के खिलाफ हरियाणा के पहले मैच में सिर्फ एक अंपायर ने अंपायरिंग की थी, क्योंकि बीसीसीआई द्वारा नियुक्त दूसरे अंपायर 'गुड़गांव' को बॉम्बे का 'गोरेगांव' समझकर बॉम्बे पहुंच गए थे। दूसरी तरफ दिल्ली-पंजाब के एक मैच में भी सिर्फ एक अंपायर ने दोनों छोर से अंपायरिंग की थी क्योंकि दूसरे अंपायर ने अंतिम समय में ड्यूटी करने से मना कर दिया था। हरियाणा-जम्मू कश्मीर मैच में टीमें सिर्फ एक ही दिन मैच खेल पाई क्योंकि जब दूसरे दिन दोनों टीमें जम्मू के मौलाना आजाद स्टेडियम में पहुंची तो उन्हें पिच खुदा हुआ मिला। अपने आखिरी लीग मैच में पंजाब पर पहली पारी की बढ़त के आधार पर हरियाणा की टीम किसी तरह क्वार्टर फाइनल में पहुंची। क्वार्टर फाइनल में उत्तर प्रदेश और सेमीफाइनल में मजबूत माने जाने वाली बंगाल को पहली पारी में बढ़त के आधार पर पिछाड़कर हरियाणा ने फाइनल में भी जगह बना ली। अब फाइनल में हरियाणा का सामना 30 बार की रणजी चैंपियन और 8 अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों वाली बॉम्बे की टीम से थी जो हैदराबाद पर पहली पारी के बढ़त के आधार पर फाइनल में पहुंची थी।

बॉम्बे का बढ़ा हुआ आत्मविश्वास

बॉम्बे टीम का आत्मविश्वास सांतवें आसमान पर था क्योंकि टीम के कप्तान संजय मांजेरकर ने सेमीफाइनल में 377 रन की एक विशाल पारी खेली थी। यह अब भी प्रथम श्रेणी क्रिकेट में भारत का दूसरा सर्वोच्च स्कोर है। टीम के अन्य बल्लेबाज भी फॉर्म में थे। विनोद कांबली ने भी दोनों पारियों में शतक बनाया था।

पहली पारी में हरियाणा का विशाल स्कोर

बहरहाल जब ऐतिहासिक वानखेड़े स्टेडियम में दोनों टीमें उतरी तो पहली पारी के बाद हरियाणा का पलड़ा भारी था। दीपक शर्मा के 199 रन और अजय जडेजा व चेतन शर्मा के क्रमश: 94 व 98 रन की बदौलत हरियाणा ने 522 रन का विशाल स्कोर खड़ा किया। टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले अमरजीत कायपी ने भी 45 रन बनाए। अपना पहला प्रथम श्रेणी मैच खेल रहे अबय कुरुविला ने 4 विकेट लिए जबकि सलिल अंकोला ने 3 विकेट लिए। हालांकि इसके लिए दोनों ने मिलकर 200 से अधिक रन दिए।
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हरियाणा को पहली पारी में बढ़त

हालांकि बॉम्बे की मजबूत बल्लेबाजी क्रम के लिए यह कोई बड़ा स्कोर नहीं था। खासकर पिछले मैच में इसी बल्लेबाजी क्रम ने 800 से ऊपर का स्कोर खड़ा किया था। इसलिए बॉम्बे की टीम अब तक इस मैच में आगे दिख रही थी। बॉम्बे के बल्लेबाजों ने भी अच्छी शुरूआत की लेकिन कोई भी बल्लेबाज अच्छी शुरूआत को बड़े स्कोर में नहीं तब्दील कर सका। बॉम्बे की तरफ से 8 बल्लेबाजों ने 30 से ऊपर का स्कोर बनाया लेकिन कोई भी बल्लेबाज तिहरे अंक को पार नहीं कर सका। सिर्फ दो बल्लेबाज ही 50 का आकड़ा पार कर सके। लालचंद राजपूत ने 74 और संजय पाटिल ने 85 रन बनाए। हरियाणा की तरफ से ऑफ स्पिनर योगेंद्र भंडारी ने करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 5 और कपिल देव ने 3 विकेट लिए। बॉम्बे की टीम चौथे दिन लंच के बाद 410 रन पर आउट हो गई। इस तरह हरियाणा की टीम ने 112 रन की एक महत्वपूर्ण बढ़त हासिल कर ली थी।

रोमांच की तरफ बढ़ता मैच

मैच चौथे दिन में प्रवेश कर चुका था और पहली पारी के बढ़त के आधार पर हरियाणा की टीम विजेता लग रही थी। लेकिन कहते हैं ना कि क्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल है और अंतिम गेंद फेंके जाने से पहले कुछ भी नहीं कहा जा सकता। इस मैच में भी कुछ ऐसा ही हुआ। मैच में अब तक आगे रहने वाली हरियाणा की टीम चौथे दिन के अंत तक 8 विकेट पर सिर्फ 159 रन बनाकर जूझ रही थी। इस तरह हरियाणा के पास 300 रन से कम की बढ़त थी और बॉम्बे के मजबूत बल्लेबाजी क्रम के आगे यह कोई मुश्किल लक्ष्य नहीं होता। लेकिन हरियाणा के जुझारू कप्तान और भारत को पहला विश्व कप दिलाने वाले कपिल देव अब भी क्रीज पर टिके हुए थे। कपिल देव ने टीम के 9वें और 10वें नंबर के बल्लेबाज प्रदीप जैन और योगेश के साथ मिलकर टीम को 242 रन के सम्मानजनक स्कोर तक पहुंचाया। इस तरह बॉम्बे को सिर्फ दो सत्रों में लगभग 67 ओवर में साढ़े पांच के मुश्किल रन रेट से 355 रन का बड़ा लक्ष्य मिला।

बॉम्बे के लिए मुश्किल लक्ष्य

उस समय जब टी-20 क्रिकेट अस्तित्व में नहीं था और वनडे क्रिकेट में भी 5 का रन रेट बहुत अच्छा माना जाता था, यह लक्ष्य लगभग असंभव ही था। खासकर कपिल देव और चेतन शर्मा के तेज गेंदबाजी आक्रमण के सामने यह और भी मुश्किल था। लेकिन बॉम्बे क्रिकेट असंभव को संभव बनाने के लिए ही जाना जाता था। भारतीय क्रिकेट के इस सबसे पुराने घर ने यूहीं 41 बार यह ट्रॉफी नहीं जीती हैं और यूहीं नहीं भारतीय टीम में अब भी बॉम्बे (मुंबई) के खिलाड़ियों का दबदबा रहता है। बॉम्बे टीम भारतीय क्रिकेट की जीवंतता का सबसे बड़ा उदाहरण है और इस मैच में भी यही साबित हुआ। बॉम्बे के बल्लेबाजों ने अपनी बल्लेबाजी से इस लगभग खत्म हो चुके मैच को फिर से जीवंत कर दिया।

बड़ा लक्ष्य, खराब शुरूआत

हालांकि बॉम्बे की शुरूआत कुछ खास नहीं थी और वह पांचवें दिन लंच तक 34 रन पर 3 विकेट गवां कर संघर्ष कर रही थी। टीम के दोनों सलामी बल्लेबाज लालचंद राजपूत व शिशिर हटंगड़ी और टीम के कप्तान संजय मांजेरकर कपिल देव और चेतन शर्मा के तेज और स्विंग गेंदबाजी के सामने सस्ते में ही पवेलियन लौट चुके थे। अब सारी जिम्मेदारी सबसे अनुभवी बल्लेबाज दिलीप वेंगसरकर और 18 साल के युवा सुपरस्टार सचिन तेंदुलकर पर टिक गई थी। हालांकि अब मुंबई के उत्साही दर्शक उम्मीद खो चुके थे और स्टेडियम छोड़कर अपने घरों की ओर लौट रहे थे।

कपिल को सचिन की क्लास

SACHIN VENGI इधर इन दोनों महान बल्लेबाजों ने अपने उत्साह को ठंडा नहीं होने दिया और इस असंभव को संभव बनाने की ठानी। दोनों ने शुरू से ही गेंदबाजों पर प्रहार करना शुरू किया। सचिन अपने स्वभाव के अनुरूप कुछ ज्यादा ही आक्रामक थे। उन्होंने कपिल देव को उनके सिर के ऊपर से ही एक शानदार छक्का जड़ा। इस छक्के को याद करते हुए कपिल कहते हैं कि यह एक शानदार क्लास वाला शॉट था और इस शॉट से ही सचिन की प्रतिभा का अंदाजा लगाया जा सकता था। सचिन ने इसके बाद चेतन शर्मा पर भी लांग ऑफ की दिशा में छक्का लगाया। क्रिकेट इतिहासकार अरूणभा सेनगुप्ता कहते हैं कि बॉम्बे की भीड़ अब फिर से वानखेड़े में वापस आने लगी थी। मैं कल्पना करता हूं कि यह लगभग वही सीन रहा होगा जैसा एम एस धोनी: दी अनटोल्ड स्टोरी में फिल्माया गया है। बस क्रिकेट प्रेमी जनता माही मार रहा है की जगह तेंदेल्या मार रहा है चिल्ला रही होगी। बहरहाल सचिन ने इसके बाद लेफ्ट आर्म स्पिनर प्रदीप जैन को अपना निशाना बनाया। उन्होंने जैन पर सामने की तीन दिशाओं में तीन छक्के जड़ें। सचिन ने दूसरे स्पिनर योगेश भंडारी पर भी तीन चौके जड़े। विश्व विजेता कप्तान कपिल देव अब हैरान हो रहे थे और धीरे-धीरे अपने फिल्डरों को पीछे की तरफ ढकेल रहे थे। अब धीरे-धीरे लक्ष्य बॉम्बे के पकड़ में नजर आने लगा था। लेकिन इस बीच सचिन 75 गेंदों पर 96 रन बनाकर आउट हो गए। योगेश भंडारी ने उन्हें टीम के सर्वश्रेष्ठ क्षेत्ररक्षक अजय जडेजा के हाथों कैच कराया।

विकेटों का पतझड़

इसके बाद वेंगसरकर का साथ निभाने आए विनोद कांबली ने भी अच्छे हाथ दिखाए और एक-दो जीवनदान मिलने के बाद 45 रन बनाए। सचिन के आउट होने के बाद संभलकर खेल रहे वेंगसरकर ने अब गियर बदला और आक्रामक रूख अपनाते हुए कपिल देव पर लांग ऑन की दिशा में दो छक्के जड़े। इसी बीच रन लेने की हड़बड़ी में वेंगसरकर के पैरों में क्रैम्प आ गया और उन्हें लालचंद राजपूत के रूप में एक रनर बुलाना पड़ा। यही बाद में बॉम्बे के हार का कारण बना। विनोद कांबली तेज 45 रन बनाकर अजय जडेजा की गेंद पर उनको ही कैच दे बैठे। इसके बाद विकेट का पतझड़ शुरू हुआ और विकेटकीपर बल्लेबाज चंद्रकांत पंडित (वर्तमान विजेता विदर्भ टीम के कोच) सहित निचले क्रम के चार बल्लेबाज जल्दी-जल्दी आउट हो गए। जब अंतिम बल्लेबाज अबय कुरूविला क्रीज पर आए तो बॉम्बे को जीत के लिए 50 रन की जरूरत थी।

वेंगसरकर का 5 गेंदों में 26 रन

वेंगसरकर ने इस अचानक बने दबाव को कम करने के लिए ऑफ स्पिनर योगेश भंडारी को निशाना बनाया और लगातार 5 गेंदों पर 26 रन बनाए। 6,4,6,6,4 के इन हिट्स को याद करते हुए एक संस्मरण में बॉम्बे के खिलाड़ी जतिन परांजपे कहते हैं कि मैं वेंगसरकर के उन शॉट्स की आवाज को अब भी महसूस करता हूं।

इमोशन से भरे अंतिम ओवर

इस तरह बॉम्बे को अब जीत के लिए सिर्फ 24 रन की जरूरत थी लेकिन उसके पास सिर्फ एक विकेट ही शेष था। हालांकि डेब्यू कर रहे अबय कुरूविला ने शानदार टेंपरामेंट दिखाया और विकेट से चिपके रहे। मौका मिलने पर ढीली गेंदों पर कुरूविला ने रन भी बनाया। इसी बीच कपिल देव की एक नीची फुलट़ॉस गेंद कुरूविला के पैड पर लगी और कपिल ने जोरदार अपील किया। लेकिन अंपायर ने इस फैसले को नकार दिया और कपिल गुस्से से भर गए। इस घटना को याद करते हुए चेतन शर्मा कहते हैं कि मैंने पाजी को इससे पहले कभी इतने गुस्से में नहीं देखा था। UMPIRE RANJEE लक्ष्य धीरे-धीरे बॉम्बे के पास और ट्रॉफी धीरे-धीरे हरियाणा से दूर जाते हुई दिख रही थी। कपिल देव ने अब सभी 9 फील्डरों को बाउंड्री पर खड़ा कर दिया था। उस समय के बैट्समैन इतने चुस्त नहीं होते थे कि बाउंड्री पर जा रही गेंदों पर दो रन ले सके। इसलिए कपिल को यह फायदे का सौदा लगा। एक तो इससे वह वेंगसरकर के तेज शॉट्स को बाउंड्री तक जाने नहीं दे रहे थे दूसरी तरफ सिंगल लेने से कमजोर अबय कुरूविला स्ट्राइक पर होते थे। जब बॉम्बे टीम को 15 गेंदों में सिर्फ तीन रन की जरूरत थी तभी एक दुर्घटना घटी। इस दुर्घटना को बॉम्बे क्रिकेट के सबसे बड़ी दुर्घटनाओं में से एक माना जाता है। कम अनुभवी कुरूविला ने चेतन शर्मा की गेंद पर फाइन लेग की तरफ एक शॉट खेला और गेंद को देखने लग गए। जबकि दूसरे तरफ वेंगसरकर के रनर राजपूत एक रन के लिए दौड़ गए। अमरजीत कयापी गेंद पर चीते की तरह झपटे और गेंद को बॉलर की तरफ थ्रो कर दिया। रन लेने के लिए लेट स्टार्ट करने वाले कुरूविला अब रनआउट हो चुके थे। कपिल देव सहित पूरी हरियाणा की टीम खुशी से उछल पड़ी जबकि वानखेड़े की भीड़ स्तब्ध थी।

वेंगसरकर के छलक पड़े आंसू

हरियाणा के उछलते-कूदते और खुशी मनाते खिलाड़ियों के बीच स्कॉयर लेग साइड में खड़ा एक खिलाड़ी रो रहा था। 9 चौकों और 5 छक्कों की मदद से 137 गेंद पर 139 रन बनाने वाले वेंगसरकर जल्द ही अपने घुटनों पर थे। वह मैदान पर अपना बैट टिका कर लगातार रोए जा रहे थे। टीम के साथी खिलाड़ी प्रसाद देसाई, वेंगसरकर के पास गए और उन्हें पवेलियन की तरफ लाए। विस्डन एशिया में एच नटराजन लिखते हैं कि ड्रेसिंग रूम में आने के बाद भी वेंगसरकर के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। वह लगातार एक कोने में बैठकर रोए जा रहे थे और किसी भी खिलाड़ी को उनके पास जाने की हिम्मत नहीं थी। वानखेड़े में  वेंगसरकर के साथ कई दर्शक भी रोते हुए दिखाई दिए थे।

कपिल के लिए विश्व कप से भी बड़ी जीत

HARYANA RANJI वेंगसरकर उस समय अपने क्रिकेटिंग जीवन के अंतिम चरण में थे। उन्होंने 80 के दशक में ही अपने सर्वश्रेष्ठ को पा लिया था और उन्हें कुछ भी साबित करने की जरूरत नहीं थी। फाइनल में शतक लगाकर वह आगामी ऑस्ट्रेलिया दौरे के लिए अपना नाम भी पक्का कर चुके थे। लेकिन वेंगसरकर के आंसू बताते हैं कि उस समय अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों और खासकर बॉम्बे के खिलाड़ियों के लिए रणजी ट्रॉफी का क्या महत्व होता था। एक साक्षात्कार में वेंगसरकर कहते हैं कि एक मुंबईकर होते हुए आप हारना नहीं सीखते हैं। शायद इसलिए ही कपिल देव भी इस रणजी ट्रॉफी जीत को विश्व कप से भी बड़ी जीत बताते हैं। Published 03 Jan 2018, 19:45 IST
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