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भारतीय हॉकी का सुनहरा इतिहास भविष्य की एक बड़ी उम्मीद भी है

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26   //    08 Feb 2018, 20:50 IST

हॉकी दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेलों में से एक है। इसके इतिहास पर नज़र डालें तो हॉकी खेल की शुरुआत कब हुई, इस बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता? लेकिन इसका इतिहास सदियों पुराना है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। यूरोप के इस लोकप्रिय खेल में 1920 के दशक में भारत ने भी पदार्पण किया। अपने पदार्पण के साथ ही भारतीय टीम इस खेल का हिस्सा बनने वाली यूरोप से बाहर की पहली टीम बनी। उस दौर में जारी यूरोप के वर्चस्व को तोड़कर भारतीय टीम ने जल्द ही इस खेल में अपनी धाक जमा ली।

भारत ने इस खेल में अपने वर्चस्व को साबित करते हुए, अपनी सफलता की नई गाथा लिखी। भारतीय टीम सन 1928 से सन 1956 तक लगातार 6 बार ओलम्पिक चैम्पियन बनी। भारतीय टीम ने उस दौर में सन 1928, 1932, 1936, 1948, 1952 और 1956 में तो खिताब जीता ही, साथ ही सन 1964 और 1980 में भी ओलम्पिक विजेता बनने में सफल रही। 8 बार की ओलम्पिक गोल्ड मेडल विजेता भारत इसके अलावा सन 1960 में रजत पदक विजेता और सन 1968 और 1972 में कांस्य पदक विजेता भी रही। सन 1971 में जब विश्व कप की शुरुआत हुई तो भारत तीसरे स्थान पर रहा। सन 1973 में फाइनल मुकाबला हार जाने के कारण उसे उपविजेता बनकर ही सन्तुष्ट रहना पड़ा। अंततः सन 1975 में भारतीय टीम विश्व कप जीतने में सफल रही।

भारत को एक चैम्पियन टीम बनाने में जिस खिलाड़ी का सबसे अहम योगदान था, वो खिलाड़ी थे भारत में खेलों के पितामह माने जाने वाले मेजर ध्यानचंद जी। दद्दा के नाम से विख्यात मेजर ध्यानचंद जी ने अपने खेल कौशल से भारतीय हॉकी टीम को दुनिया का सिरमौर बनाया। उनका काल भारतीय हॉकी का स्वर्णिम काल था। इस दौर में भारतीय टीम से पार पाना किसी भी टीम के लिए आसान नहीं था। वैसे भी दद्दा को 'हॉकी का जादूगर' यूँ ही नहीं कहा जाता, उनको 'हॉकी का जादूगर' कहे जाने के पीछे जो कारण था, उनकी स्टिक से गेंद ऐसे चिपक जाती थी जैसे चुम्बक से लोहा चिपक जाता है। 'हॉकी के जादूगर' दद्दा ने न सिर्फ भारतीय खेल जगत को नये मुकाम पर पहुँचाया, बल्कि हॉकी के खेल को अंतरराष्ट्रीय खेल जगत में उचित जगह दिलाई। भारतीय खेल जगत के इस सबसे बड़े खिलाड़ी ने हिटलर तक को अपना फैन बना लिया था। उनको डान ब्रेडमैन और पेले के साथ दुनिया के सर्वकालीन महान खिलाड़ियों में शुमार किया जाता है।

यूरोप से शुरू हुई हॉकी में वो ऐसा समय था कि जब हॉकी को सिर्फ एशियाई देशों का ही खेल माना जाने लगा। उस समय एशियाई टीमों भारत और पाक का ही इस खेल में सर्वाधिक वर्चस्व था। लेकिन नब्बे का दशक आते-आते हॉकी में एस्ट्रो टर्फ का आगमन हो गया। एस्ट्रो टर्फ के आने से तो जैसे इस खेल की तस्वीर ही बदल गई। जहां एस्ट्रो टर्फ आने से पूर्व नियंत्रण के साथ क्लासिक हॉकी खेलने वाले खिलाड़ियों और देशों का दबदबा रहता था, वहीं इसके आने के बाद तेज हॉकी खेले जाने लगी और नियंत्रण के बजाय तेजी से खेलने वाले खिलाड़ियों तथा देशों का दबदबा बढ़ने लगा। इसी कारण समय बीतने के साथ-साथ कलात्मक हॉकी खेलने वाले इन दोनों एशियाई शेरों की चमक फीकी पड़ने लगी। इससे न सिर्फ यूरोप ने इस खेल में पुनः अपनी जड़ें जमानी शुरू कर दीं, बल्कि दूसरे महाद्वीपों की टीमों ने भी इस खेल में अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी। नब्बे के दशक के बाद तो भारत और पाकिस्तान दोनों ही टीमों की हालत और भी पतली हो गई। दोनों ही टीमें चैम्पियन टीम से फिसड्डी टीमें बनकर रह गईं।

पिछले कुछ दशकों में भारतीय हॉकी टीम के प्रदर्शन की बात करें, तो उसका हाल धूप-छाँव जैसा रहा है, उसमें भी हार की कड़ी धूप अधिक मिली है जीत की सुकून भरी छाँव कम ही नसीब हुई है। अपने 'राष्ट्रीय खेल' के स्वर्णिम दौर की पुनरावृत्ति देखने के लिए खेल प्रेमियों की नज़रें तरस गईं हैं। एक समय हॉकी के खेल में अपने दिग्गज खिलाड़ियों मेजर ध्यानचंद, कैप्टन रूप सिंह, अजीत पाल सिंह, गोविन्दा, गणेश, अशोक कुमार, जफर इक़बाल, मौहम्मद शाहिद, परगट सिंह, धनराज पिल्लै आदि के बल पर दुनियाभर में अपनी धाक जमाने वाली भारतीय हॉकी के इतिहास में सन 2008 में वो काला दिन भी आया जब टीम ओलम्पिक खेलों के लिए क्वालीफाई करने में भी नाकाम रही।

आखिर भारतीय हॉकी टीम की ऐसी दुर्दशा क्यों है? यदि इसका विश्लेषण करें तो हमें भारतीय हॉकी टीम की जो कमजोरियां नज़र आती हैं, उनमें उसकी एक बड़ी कमजोरी पेनल्टी कॉर्नर को गोल में कन्वर्ट न कर पाने की रही है। अक्सर देखा गया है कि भारत किसी भी मैच में पेनल्टी कॉर्नर तो कई सारे हासिल करने में कामयाब रहता है, लेकिन जब उन्हें गोल में तब्दील करने का सुनहरा मौका हाथ आता है तो वो इसमें नाकाम रहता है। इंडियन हॉकी की एक अन्य बड़ी कमजोरी अंतिम कुछ क्षणों में शिथिलता दिखाते हुए विरोधी टीम से गोल खा कर मैच गवां देने की भी रही है। हाल के कुछ सालों में ऐसे अनेकों उदाहरण देखने को मिल जाएंगे, जब भारत ने जीते हुए या ड्रा की ओर जाते हुए मैच अंतिम कुछ क्षणों में गोल खा कर हाथ से निकाल दिए। विरोधी टीमों को आसानी से पेनल्टी कॉर्नर हासिल करने देना भी भारतीय हॉकी टीम की बड़ी कमजोरियों में शुमार है। अक्सर देखा गया है कि भारतीय खिलाड़ियों को छकाकर पेनल्टी कार्नर हासिल करने में विरोधी टीमों को ज्यादा दिक्कत नहीं होती। भारतीय हॉकी की एक और जो समस्या रही है, वो है अच्छे खिलाड़ियों की उपेक्षा। 'हॉकी के तेंदुलकर' धनराज पिल्लै हों या फिर जगवीर सिंह, परगट सिंह हों या जुगराज सिंह, इन जैसे न जाने कितने ही प्रतिभाशाली खिलाड़ी ऐसे हुए हैं जिनकी हॉकी फेडरेशन ने उपेक्षा की है, उन्हें अपनी प्रतिभा साबित करने के उचित अवसर नहीं दिये गए। इसके अलावा अन्य खेलों ही की तरह नेताओं और नौकरशाहों के दखल के चलते भी हॉकी का बेड़ा गर्क हुआ है!

लेकिन इस सब के बाबजूद भी एक क्षेत्र ऐसा है, जिसमें भारत ने अपनी पकड़ लगातार मजबूत बनाये रखी है, वो है गोल कीपिंग। भारत में हमेशा से ही शानदार गोल कीपरों की परंपरा रही है। सुबैय्या, आशीष बलाल, एड्रियन डिसूजा, भरत क्षेत्री आदि इसी के कुछ उदाहरण हैं। इन सभी गोल कीपरों ने अपने शानदार खेल से दुनिया के सभी बड़े खिलाड़ियों को छकाया है। वर्तमान समय में भी भारतीय गोल कीपर श्रीजेश लाजवाब प्रदर्शन कर रहे हैं। युवा गोल कीपर सूरज करकेरा और आकाश चिकते भी अवसर मिलने पर इस परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं।

सर्वाधिक गोल करने का रिकॉर्ड अपने नाम करने वाले खिलाड़ी सोहेल अब्बास और भारतीय गोल कीपर एड्रियन डिसूजा के बीच होने वाली रोमांचक टक्करों को भला कौन खेल प्रेमी भूल सकता है, जब दुनियाभर के सभी बड़े गोल कीपरों को छकाने वाले सोहेल अब्बास का सामना एड्रियन डिसूजा से होता था, तो वो सोहेल अब्बास के सामने दीवार की तरह खड़े हो जाते थे। फील्ड गोल तो दूर पेनल्टी कार्नर तक पर गोल करने के लिए उन्हें कड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी। इन दोनों खिलाड़ियों की भिड़ंत न सिर्फ हॉकी बल्कि खेल इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज की जाएगी।

यदि भारतीय हॉकी को उसका पुराना मुकाम हासिल करना है तो उसे अपनी कमजोरियों से पार पाना होगा। खास तौर पर अंतिम क्षणों में शिथिलता को त्यागकर अपना नियंत्रण बनाये रखना होगा। इसके अलावा हाथ लगे पेनल्टी कॉर्नर को भी भुनाना होगा एवं विरोधी टीमों को आसानी से पेनल्टी कार्नर देने से भी बचना होगा। अपनी इन कमजोर कड़ियों से पार पाकर ही हम फिर से अपने 'राष्ट्रीय खेल' हॉकी में अपने सुनहरे इतिहास को दोहरा पाएंगे।

 

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