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CWG 2022 : जूडोका सुशीला देवी डिप्रेशन को हराकर बनी ओलंपियन, अब कॉमनवेल्थ में गोल्ड लाने को तैयार

27 साल की सुशीला ने ग्लास्गो कॉमनवेल्थ खेलों में सिल्वर मेडल जीता था।
27 साल की सुशीला ने ग्लास्गो कॉमनवेल्थ खेलों में सिल्वर मेडल जीता था।
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Hemlata Pandey

भारत की जूडो खिलाड़ी सुशीला देवी जूडो के मैट पर तो फाइटर हैं हीं असल जिंदगी में भी मुश्किलों से लड़कर इस खेल में अपनी अलग पहचान हासिल कर चुकी हैं। 27 साल की सुशीला जूडो की 48 किलोग्राम वेट कैटेगरी में खेलती हैं। साल 2014 के ग्लासगो कॉमनवेल्थ खेलों में सुशीला ने देश को सिल्वर मेडल दिलवाया था। लेकिन 2018 में एक घटना के बाद वो डिप्रेशन में चलीं गईं थीं। लेकिन सुशीला ने हार नहीं मानीं। वो ना सिर्फ टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने में कामयाब रहीं बल्कि अब बर्मिंघम कॉमनवेल्थ खेलों में जूडो में भारत की सबसे प्रबल मेडल दावेदार हैं।

एक मुकाबले में अपने विरोधी के खिलाफ दांव लगाती सुशीला देवी।
एक मुकाबले में अपने विरोधी के खिलाफ दांव लगाती सुशीला देवी।

मणिपुर की रहने वाली सुशीला ने 2014 के कॉमनवेल्थ में सिल्वर जीतने के बाद 2018 के एशियन गेम्स में गोल्ड जीतने की ठानी। लेकिन एशियन गेम्स के लिए हो रहे ट्रायल के दौरान सुशीला को हैमस्ट्रिंग टियर हुआ जिस कारण न सिर्फ वो एशियन गेम्स के लिए जाने में नाकामयाब रही बल्कि उनकी चोट से खेल पर असर पड़ने का खतरा हो गया। सुशीला ने एक इंटरव्यू में जिक्र किया कि वो इस पूरे वाकये के कारण डिप्रेशन में चली गईं थीं। सुशीला इम्फाल अपने घर वापस लौटीं। अपने कोच जीवन शर्मा की मोटिवेशनल बातों पर ध्यान लगाया और धीरे-धीरे मानसिक रूप से खुद को मजबूत किया।

2019 के साउथ एशियाई खेलों में सुशीला ने गोल्ड जीता और टोक्यो ओलंपिक को लक्ष्य बनाकर तैयारी करने लगीं लेकिन किस्मत फिर साथ नहीं रही। 2021 में होने तय हुए टोक्यो ओलंपिक के लिए किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में एशिया-ओशियाना क्वालिफायर्स के लिए जो भारतीय दल गया उसके दो खिलाड़ी कोविड पॉजिटिव पाए गए। ऐसे में सुशीला समेत पूरी भारतीय टीम को क्वालिफायर से लौटा दिया गया। सुशीला का टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने का सपना टूट गया।

2018 में साउथ एशियन जूडो चैंपियनशिप का गोल्ड जीतने के बाद सुशीला।
2018 में साउथ एशियन जूडो चैंपियनशिप का गोल्ड जीतने के बाद सुशीला।

लेकिन इसके बाद सुशीला की किस्मत ने साथ दिया और उन्हें महाद्वीपीय कोटा के जरिए ओलंपिक में एंट्री मिली और वो इन खेलों में जूडो के लिए क्वालीफाई करने वाली इकलौती भारतीय बनीं। लेकिन तैयारी करना आसान नहीं था। कोविड-19 के कारण पैदा हुए हालात के बाद सुशीला घर पर ही स्थानीय खिलाड़ियों के साथ प्रैक्टिस करती रहीं और टोक्यो गईं। हालांकि सुशीला शुरुआती बाउट में हार गईं, लेकिन उन्होंने जिस मेहनत से ओलंपियन बनने का सफर पूरा किया वो प्रेरणादायक है।

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सुशीला मणिपुर पुलिस में काम करती हैं और जूडो के शुरुआती गुर अपने चाचा लिकमाबम दिनित से सीखे हैं जो खुद अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रह चुके हैं। सुशीला को कॉमनवेल्थ खेलों में अपने सिल्वर को गोल्ड में बदलने का मौका 8 साल बाद मिला है क्योंकि साल 2018 के खेलों में जुडो को शामिल नहीं किया गया था। इस बार सुशीला समेत कुल 6 भारतीय खिलाड़ी जूडो में भाग ले रहे हैं। सुशीला 1 अगस्त को अपना मुकाबला खेलेंगी।


Edited by Prashant Kumar
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