क्वार्टरफाइनल में हारने के बावजूद साक्षी मलिक ने कैसे कांस्य पदक जीता? रेसलिंग के रेपचेज राउंड को समझिए

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रियो ओलंपिक्स 2016 में भारत का सफर तब तक अच्छा नहीं था जब तक साक्षी मालिक ने देश को पहला पदक नहीं दिला दिया। करोड़ो भारतीयों को पहला पदक हासिल करते और भारत का झंडा ऊपर उठते हुए देखने की तमन्ना थी जो टूर्नामेंट के शुरुआती 12 दिनों में अधूरी थी। मगर बुधवार देर रात या यू कहें कि गुरुवार की सुबह रेसलिंग के माध्यम से साक्षी मलिक के देश को इस भावना को महसूस करने का मौका दिया। भारत के पारंपरिक खेल रेसलिंग की वजह से करोड़ो देशवासी भारतीय ध्वज को ऊपर उठता देखने के साक्षी बने। हमारे देश के रेसलरों ने पिछले तीन ओलंपिक में चार पदक जीते, जिसमें सबसे पहला नाम सुशील कुमार का आता है। सुशील ने 2008 बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक जीता। इसके बाद 2012 लंदन ओलंपिक में उन्होंने रजत पदक और योगेश्वर दत्त ने कांस्य पदक जीता। अब साक्षी मलिक ने 2016 रियो ओलंपिक्स में कांस्य पदक रचकर इतिहास रच दिया। साक्षी ओलंपिक के पोडियम पर खड़े होकर मेडल हासिल करने वाली पहली भारतीय महिला रेसलर बन गई हैं। मगर जैसा कि हम जानते हैं, साक्षी को क्वार्टरफाइनल में वलेरिया कोब्लोवा से शिकस्त झेलना पड़ी थी। हारने के बावजूद भारतीय महिला रेसलर कांस्य पदक जीतने में कामयाब कैसे हुई? इसका जवाब रेसलिंग का एक अनोखा नियम है "रेपचेज", जिसे हम समझाने जा रहे हैं अन्य भारतीय रेसलरों का उदाहरण देकर। 8 भारतीय रेसलरों ने पुरुष फ्रीस्टाइल, महिला फ्रीस्टाइल और पुरुष ग्रीको-रोमन स्पर्धाओं में रियो ओलंपिक्स के लिए क्वालीफाई किया था। रेसलिंग स्पर्धा के पहले दिन रविंदर खत्री पुरुषों की 85 किग्रा ग्रीको-रोमन के राउंड ऑफ 16 में हंगरी के विक्टर लोरिंसेज से शिकस्त खा गए थे। मगर खत्री के पास कांस्य पदक हासिल करने का मौका होता अगर उनके विरोधी रेसलर फाइनल में प्रवेश कर जाते। रेपचेज प्रणाली का परिदृश्य ऐसा ही है, जिसमें शीर्ष दावेदारों को जल्दी बाहर होने के बावजूद पोडियम पर खड़े होने के लिए एक बेहतर मौका मिलता है। हर वो रेसलर जो नॉकआउट के दौरान दो संभावित फाइनलिस्ट्स को हराता हो, वो रेपचेज में हिस्सा ले पाता है। रेसलिंग में कांस्य पदक दो पहलवानों को दिए जाते हैं, एक तो जो रेपचेज राउंड से आए और दूसरा जो लगातार खेलकर पहुंच रहा हो। इसे और बेहतर समझने के लिए योगेश्वर दत्त के 2012 ओलंपिक में कांस्य पदक का उदाहरण ले सकते हैं। योगी पुरुष 60 किग्रा फ्रीस्टाइल रेसलिंग के राउंड ऑफ 16 में रूस के बेसिक कुडुखोव से हार गए थे, जिन्होंने फाइनल में प्रवेश करते हुए रजत पदक जीता था। बेसिक के फाइनल में पहुंचने से योगेश्वर को दूसरा मौका मिल गया और वह रेपचेज में खेलने के लिए योग्य बन गए। भारतीय रेसलर ने सबसे पहले पुएर्टो रिकन फ्रेंक्लिन गोमेज़ का सामना किया, जिन्हें कुडुखोव ने क्वालीफ़ायर्स में बाहर किया था। गोमेज़ को हराने के बाद, योगेश्वर का सामना रेपचेज के दूसरे राउंड में कुडुखोव के क्वार्टरफाइनल विरोधी ईरान के मासौद एस्मेइल्पौर से हुआ। इस मुकाबले में जीत से योगेश्वर के कांस्य पदक हासिल करने की उम्मीद बढ़ जाती। उन्होंने इसे जीता और फिर नॉर्थ कोरिया के री जोंग-मियोंग को हराकर भारत के लिए लंदन ओलंपिक्स में रेसलिंग में दूसरा पदक जीता। इस चित्र में मानिए कि 1 और 16 ने फाइनल्स में प्रवेश किया :

  • जो 1 और 16 से हारे क्रमशः (2,3,5 और 15,13,9) उनके नाम पर गोला लगा दिया गया है और वह सभी अलग से कांस्य पदक के लिए फाइट कर सकते हैं।
  • लाल गोले वाले खिलाड़ी अलग से कांस्य पदक के लिए उपलब्ध होंगे, जबकि नीले गोले वाले खिलाड़ी एक और कांस्य पदक के लिए प्रतिस्पर्धा करेंगे।
  • कांस्य पदक की लड़ाई इस क्रम में होगी : 2 और 3 मैच खेलेंगे, अगर 2 जीता तो वो 5 से लड़ेगा। 2 और 5 में से जो जीतेगा वो कांस्य पदक जीत जाएगा। इसी प्रकार 15 और 13 के बीच मुकाबला होगा, अगर 15 जीता तो उसे 9 से भिड़ना होगा। 15 और 9 में से जो जीतेगा वो दूसरा कांस्य पदक जीतेगा।
  • अगर रेसलर फाइनलिस्ट से हारे, तो उसके लिए बेहतर होता है। अगर वह सेमीफाइनल में हारे, तो उसे एक मुकाबला जीतकर कांस्य पदक मिल सकता है। इसी प्रकार अगर रेसलर क्वार्टरफाइनल में हारा तो उसे दो मुकाबले जीतकर कांस्य पदक तक का सफर तय करना पड़ता है। अगर राउंड ऑफ 16 में कोई हारे तो उसे तीन मुकाबले जीतना होते हैं।

रेपचेज प्रणाली से भारतीय रेसलरों ने एक से अधिक पदक जीतने में कामयाबी हासिल की है, जिसमें सबसे नया नाम साक्षी मलिक का जुड़ गया है। क्या रियो में रेपचेज से और भारतीय पहलवानों को मदद मिलेगी? ज्यादातर भारतीय फैन्स चाहेंगे कि रेपचेज प्रणाली की जरुरत नहीं पड़ी। हम भी ऐसा ही चाहते हैं, क्योंकि भारतीय पहलवानों को सभी स्वर्ण या रजत पदक जीतते देखना चाहते हैं।

Edited by Staff Editor